الجمعة، 29 مارس 2019

स्त्री शक्ति की उपयोगिता आवश्यक !

स्त्री शक्ति की उपयोगिता आवश्यक !
स्त्री शक्ति की उपयोगिता आवश्यक !


स्त्री यानि त्याग की प्रतिमूर्ति कहने सुनने में यह पुस्तक में लिखा शब्द लगता हैं। प्रकृति में स्त्री और पुरुष में भेद करते समय बल पुरुष को, सहनशीलता स्त्री को, दी उन्होंने सोचा भी नहीं होगा की पुरुष का यह बल स्त्री की रक्षा की अपेक्षा उस पर अन्याय करने में कई लोग उपयोग करेंगे और स्त्री की सहनशीलता उसका बल होने की अपेक्षा उसे कमजोर करेगा। आज बदलते परिवेश में स्त्री पुरुषों के बीच समानता नजर तों आ रही है परन्तु उसके अधिकार को स्वीकार नहीं कर पाया है यह समाज ! मैंने अपने व्यक्तिगत अनुभव से भी यह देखा की समाज में ३३ % आरक्षण के पश्चात सरपंच, विधायक एवं अन्य पदों पर स्त्रीयों की नियुक्ति या तो हुई पर प्रतिनिधि के तौर पर उनके पति अपनी राजनिति को चमकते रहते है। मैंने अपने निजी अनुभव में एक महिला चिकित्सक को अपने पति से डरते हुए देखा है पति ने कह दिया इतना बड़ा नर्सिंग होम लेकर बैठे हैं, बड़ा स्टाफ है, चार सोनोग्राफी, तीन ऑपरेशन नहीं हुए तो आर्थिक व्यवस्था संभव नहीं, दर में वह महिला चिकित्सक न चाहते हुए भी अपने पेशेंट को आर्थिक हानि पहुंचती है,कचोटता हुआ उनका मन उनके उदास चेहरे पर साफ नजर आता है। 

स्त्री शक्ति की उपयोगिता आवश्यक !
स्त्री शक्ति की उपयोगिता आवश्यक !


समाज में स्त्री उदारता के भाव उत्त्पन्न तो हुए है, पर मन अभी यह स्वीकार नहीं कर पा रहा है।  तेज़ स्वाभाव वाली स्त्रियाँ  भी समाज में हैं। कहते है, पुरुषों का एक संगठन पत्नी पीड़ित का भी हैं परन्तु यह कम नज़र आता हैं। 







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स्त्री की शत्रु स्त्री भी होती है 

घर, परिवार, समाज में नारी सम्मान का यह प्रश्न स्त्री-पुरुष के मध्य तो है परन्तु कई परिवारों में रिश्तों की दरार, वर्चस्व की लड़ाई, प्रतिस्पर्धा का भाव और तेरा-मेरा करने की प्रकृति से एक औरत ही औरत की शत्रु बन जाती है। व्यावहारिक जीवन की विषमताएँ  घर से ही प्रारम्भ होती है। उसका प्रभाव धीरे-धीरे समाज पर पड़ता जाता है।  आज बदलते परिवेश में घरेलु प्रकरणों में कमी आई है।  इसका प्रमुख कारन शिक्षा और समाज में बढ़ती जागरूकता है। बेटे-बेटी में अंतर करने वाला यह समाज कब बहु को बेटी के रूप में स्वीकार कर पाएंगे यह विचारणीय प्रश्न है।


स्त्री शक्ति की उपयोगिता आवश्यक !
स्त्री शक्ति की उपयोगिता आवश्यक !

बेटियाँ निभा रही है, बेटों की भूमिका 

समाज में बदलाव इस कदर आ गया है कि वंश बेल की चाह में सात बेटी तक इंतज़ार करने वाले युग में बदलाव आ गया है। बेटियाँ बेटों के रूप में अपने माता-पिता की देखभाल कर रही हैं। सम्पत्ति में अधिकारों का जीवन हर क्षेत्र में कर्तव्य निभाकर, बेटियां अपने आप को सिद्ध कर रही है। 

स्त्री दिवास तक सम्मान सिमित नहीं 

नारी शक्ति के सम्मान की परम्परा युगों से चली आ रही है, इसे बरक़रार रखना चाहिए। हम पुरुष प्रधान समाज में नारी का अपमान कर स्वयं को कुछ समय तो सिद्ध  लेते है परन्तु जब चिंतन करेंगे तो पाओगे की हमारे लिये पल-पल जीने वाली नारी कभी स्वयं के  सोचती। घर परिवार में बच्चे, पति, बड़े-बुजुर्ग सभी के पश्चात् भोजन करने वाली नारी जिस दिन पुरुष मानसिकता की तरह जीने लग जाएगी तभी पता चलेगा पुरुष को की हम क्या प्राप्त कर रहे है और हमें क्या करना चाहिए। 

स्त्री शक्ति की उपयोगिता आवश्यक !
स्त्री शक्ति की उपयोगिता आवश्यक !

स्वयं सिद्ध बनना होगा नारी को 

स्त्री स्वयं को सिद्ध कर पाने में सक्षम होकर भी सदैव मुँह उठाकर पिता, पति, भाई व भाई की ओर तकती रहती है। समाज में परित्यक्ता नारियों की संख्या अब बड़ी मात्रा में बढ़ने लगी है। प्रसन्नता भी होती है, यह देखकर कि लड़ने की प्रवृति ने स्त्री को स्वयं सिद्धा बनाने में बड़ी भूमिका अदा की है।  किसी की पत्नी, किसी की बेटी, किसी की बहु बनना बुरा नहीं है, मगर जब हमारे सम्मान के मूल्यों पर यह रिश्तें मिल रहे हो तो सौदा महंगा है। माना कि स्त्री पुरुष एक दूसरे के पूरक होते है परन्तु जब यह दोनों ओर से सहयोगात्मक हो तो ! गीता बबिता ने अपने पिता को अपने नाम से पहचान दिलायी। कल्पना चावला के पिता कौन थे ? निर्मला सीतारमण के पति कौन है ? इन प्रश्नो के जवाब अधिकत्तर लोगो को नहीं पता होंगे परन्तु ये महिलाएं कौन है और क्या कर सकती हैं यह आज पूरी दुनिया को पता है। 

الخميس، 18 أكتوبر 2018

कन्या पूजन केवल औपचारिकता न बने !

कन्या पूजन केवल औपचारिकता न बने !
कन्या पूजन केवल औपचारिकता न बने !
नवरात्री में सभी देवी  दुर्गा स्वरुप मातृशक्ति का आशीर्वाद जन-जन ने प्राप्त किया। गरबा पंडालों में डंडियां की धूम रही। नृत्य मनमोहक संगीत और रंग बिरंगी पोशाक से परिपूर्ण होकर धर्म और आध्यात्म के साथ जुड़ने का अवसर किसी भी व्यक्ति ने हाथ से नहीं जाने दिया।
                                                                          बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ के इस युद में घर-घर एवं समाज में सामाजिक संस्थाओं के तौर पर कन्या पूजन एवं कन्या भोज के भी आयोजन किये गए। समाज में स्वीकार्य इस परम्परा को सभी ने सहर्ष स्वीकार किया। अनुसरण भी किया ! मगर क्या यह सब परम्पराओं का जीवन की सत्यताओं से जुड़ाव हो सकेगा, यह संभव नहीं लगता हैं।

कन्या में मातृशक्ति है स्वीकारना होगा 


ये देश समाज कन्या के इस स्वरुप को किस रूप में स्वीकार कर रहा है, यह देखकर भी विकृत मानसिकता वाले लोगो की संख्या में कमी नहीं आई है।  आज इस समाज में बेटियों को असुरक्षित माना जा रहा है। हम समाचार पत्रों और मिडिया के माध्यम से देखते है कि तीन वर्ष की कन्या से बलात्कार दो वर्ष की कन्या से अत्याचार तो समाज के विकृत रूप पर शर्म एवं घिन्नता का अनुभव होने लगता है। आज के इस युग में जब हमारे पास उन्नतशील होने की सभी परिस्थियाँ उपस्थित है। हम बेटी को दूसरे दर्जे की मान्यता कैसे दे सकते है। समाज में कई कुरीतियाँ जो हमने आज की असुरक्षा की भावना से उपजी थी। आज मोबाइल एवं कम्प्यूटर के युग में हमने आधुनिकता को तो स्वीकार किया है परन्तु स्त्री शक्ति को स्वीकारने में हमें बहुत देर हो गई हैं। अभी भी वक्त है, स्वीकार करने का ! समय पर यदि हम जाग गए तो हम एक उन्नत राष्ट्र के निर्माण की संकल्पना को साकार कर पाएंगे। 



घर से देना होंगे स्त्री-शक्ति सम्मान के संस्कार 


प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने लाल किले के अपने भाषण में कहा था कि हमें सिर्फ बेटियों पर नहीं बेटों पर भी नज़र रखनी चाहिए। बेटा रात को कितनी बजे घर आता है ? उसके कौन मित्र है ? उसकी क्या आदतें हैं ? वह छोटे-बड़ों का अंतर समझता है या नहीं ? स्त्री के प्रति उसकी नज़रें ठीक दिशा में कार्य कर रही है या नहीं ? जिनको बेटियाँ है वे बेटियों को बांध कर घर में बैठा दे यह वर्तमान परिस्थिति में संभव नहीं है।

मुगलों के समय था असुरक्षा का भाव 

भारतीय इतिहास में जब मुगलों ने इस देश पर आक्रमण किया था तब हमारी बहु-बेटियां सुरक्षित नहीं थी।  उन्हें सुरक्षित करने के लिए रजस्वला होने से पूर्व उनका विवाह संपन्न करा दिया जाता था। इस देश में बाल विवाह की कुरीति ने इस कारण जन्म लिया। यह देश आक्रांताओं से असुरक्षित रहा और उन स्थितियों का सामना करने के बाद देश की परिस्थितियों को बदला है। आज देश में सर्वधर्म समभाव भी है ! स्त्री शिक्षा भी हैं और स्त्री को समान अधिकारों की बात भी की जा रही है। ऐसे में स्त्री की प्रति नज़रिए को बदलना बहुत आवश्यक हैं। हम ऐसे राष्ट्र का निर्माण करना चाहते हैं जहाँ सबको अपनी जिंदगी जीने का हक़ दे सके तो ही हमारी शिक्षा चेतना शुन्य होने से बचेगी ! हमें नारी के सम्मान को प्रथम पायदान पर रखना होगा। 

الجمعة، 12 أكتوبر 2018

करूँ वंदना मातृ चरणों में ! कन्या पर अभिमान किया !!

करूँ वंदना मातृ चरणों में ! कन्या पर अभिमान किया !!
करूँ वंदना मातृ चरणों में ! कन्या पर अभिमान किया !!


माँ के चरणों में वंदन कर !
मैंने यह प्रण ठान लिया !!

मातृ शक्ति के मान बिंदु !
पर अपना सब कुछ त्याग दिया !!

करूँ वंदना मातृ चरणों में !
कन्या पर अभिमान किया !!

स्त्री शिक्षा की प्रगति में !
आग्रहपूर्ण व्यवहार किया !!

आओ हम सब मिलकर !
अब नारी का मान बढ़ाते हैं !!

गंगा की पावन धारा-सा !
निर्मल राष्ट्र बनाते हैं !!

हमने बचपन से सीखा हैं !
करना चरण वंदना माता की !!

लाज लिए अपनी आँखों में !
श्रद्धा भाव भरने की !!

भारत में नदियों को, भूमि को !
हमने माता माना हैं !!

नारी का सम्मान करें सब ! 
मानवता का नाता हैं !!

الثلاثاء، 2 أكتوبر 2018

गाँधी ब्रांड को भुनाया कांग्रेस ने ! सपना साकार किया मोदी ने !!

गाँधी ब्रांड को भुनाया कांग्रेस ने !  सपना साकार किया मोदी ने !!


राष्ट्रपिता श्री मोहनदास करमचंद गाँधी  ने इस राष्ट्र के आज़ादी के स्वप्न को पूर्ण करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अहिंसा, त्याग, सत्य, स्वछता के प्रेरक सन्देशों को देकर गाँधी जी ने देश को दिशा देने का प्रयत्न किया। आज़ादी के समय देश के एकमात्र राजनीतिक दल कांग्रेस ने गाँधी नाम और पदचिन्हों पर चलने का संकल्प लेकर इस देश में 60 वर्षों तक सत्ता का संचालन किया। इन 60 वर्षों में राष्ट्र निर्माण में आने वाली नीतियों का मार्ग स्वयं गाँधी जी ने कांग्रेस को प्रदान किया, तो क्या कांग्रेस गाँधी जी के उन सिद्धांतों के आधार पर सत्ता संचालन में कामयाब हो पाई। आज जब देश राजनीति के दूसरे दौर से गुजर रहा है, वक्त है उन सिद्धांतो की समीक्षा करने की !  क्या  सिद्धांतो कोण जनमानस तक पहुँचाने में कामयाब हो पाई कांग्रेस ? क्या स्वदेशी आंदोलन का महत्वपूर्ण सन्देश हमारे यहाँ कुटीर उद्योगों के रूप में घर-घर की बेरोजगारी दूर कर पाए ?क्या हम हिंदी को राष्ट्र भाषा बनाने में कामयाब हो पाए ? क्या हम स्वच्छता को राष्ट्रिय संकल्प के रूप में आंदोलन बना सके ? क्या देश में अब भी खादी अपने वजूद को प्राप्त कर चुकी है ?

हम राष्ट्र को गौरव प्राप्ति के मुद्दों को ही महत्त्वपूर्ण मानकर अंजाम देंगे तो भी गाँधी जी के सपनो को साकार करने में कामयाब हो जायेंगे !

आज भी हिन्दू समाज दूसरे दर्जे पर 

गाँधी जी ने आज़ादी प्राप्ति के पश्चात  जो बंटवार का निर्णय लिया उसमें भारत को हिन्दू समाज के लिए हिंदोस्तां नाम देकर प्रतिपादित किया था परन्तु 60 दशक बीत जाने के पश्चात् भी आज हिन्दू समाज एवं हिन्दू धर्म के प्रति निर्णयों में दूसरे दर्जे पर रखा जाता है। अम्बेडकर जी ने संविधान निर्माण के समय गाँधी जी के सपनो का ध्यान रख कर मुस्लिम समाज को अल्पसंख्यक होने के नाते बहु, पत्नी, बहुविवाह एवं अन्य कई रियायतें देकर बढ़ावा दिया। कांग्रेस को मुस्लिमों ने सदैव सुरक्षित सत्ता का केंद्र माना ! इन सम्पूर्ण निर्णयों में गाँधी जी के उसूलों की चिंता थी, परन्तु राजसत्ता प्राप्ति के पश्चात समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर चलने का चिंतन शायद न गाँधी जी दे सकें, न कांग्रेस अपने शासन में तय कर सकी। 



स्वदेशी आंदोलन पिछड़ा 

गाँधी जी के स्वदेशी अपनाओं आंदोलन के सन्दर्भ में प्रथम सरकार से ही हम पिछड़ने लगे थे। कहते है प्रथम प्रधानमंत्री के कपड़ों की व्यवस्था, धूम्रपान की व्यवस्था विदेशों से होती थी ! सरकार के निर्णय भी उसी दिशा में चल पड़ते है हमारे कृषक, हमारी शिक्षा, हमारी चिकित्सा और हमारा इतिहास तक अपने सही मार्ग का निर्धारण नहीं कर सका ! देश जब पीछे मुड़कर देखता है तो पता चलता है कि हम गाँधीवादी सिद्धांतो को काफी पीछे छोड़ चुके है। आज बड़े-बड़े शॉपिंग मॉल उसमें बिकने वाली ब्रांडेड वस्तुएं, मेकलें की शिक्षा पद्धति हो या अंग्रेजी चिकित्सा पद्धति, हमारे दैनदिन जीवन में अगर सुबह से रात तक हम गणना करे तो हम अपनी जीवन पद्धति में स्वदेशी को भूल चुके है। 


स्वच्छता का सन्देश नहीं पहुंचा, अब बदलाव दिखता है 

गाँधी जी ने अपने स्वयं के जीवन में सफाई को महत्पूर्ण मानकर जनता को सन्देश दिया। स्वच्छता के लिए कार्य करने वाले समाज को ईश्वर का दूत मान कर हरिजन नाम प्रदान किया परन्तु सरकार उस समाज को वोट बैंक मानकर लाभ तो देती रही परन्तु स्वच्छता को एक आंदोलन के रूप में देश के सामने रखने में कामयाब नहीं हो सकी। 2014 में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी  की सरकार बनने के बाद 2 अक्टूबर से स्वच्छता के लिए झाड़ू उठाकर देश को गाँधी जी के मार्ग पर चलने का सन्देश दिया। अपनी टीम में 9 स्वच्छता दूत बनाकर जन-प्रतिनिधियों को अपने क्षेत्र में यह सब करने का सन्देश दिया तो देश ने इसे क्रन्तिकारी कदम मानकर सहर्ष स्वीकार किया। आज देश के अधिकांश घरों तक शौचलय की सुविधा पहुंचाने का प्रयास सरकार कर रही हैं। 


शाकाहार और सादगी 

गाँधी जी के विचारों में शाकाहार और सादगी भी महत्वपूर्ण  स्थान रखता है। वैसे देश में कई प्रधानमंत्री आये और देश पर राज किया परन्तु सादगी पूर्ण जीवन की मिसाल कम ही कायम कर सके। विदेश एवं ब्रांडेड का शौक़ हो या जीवन के सादगीपूर्ण व्यवहार में भी कम लोग गाँधी जी के इस सिद्धांतों को साकार कर सके। शाकाहार चूँकि एक मानवीय व्यावहारिक पहलू है परन्तु न्यायपालिका एवं कार्यपालिका ने इस व्यक्तिगत निर्णयों की श्रेणी में रखकर तरजीह नहीं दी। 

चित्रों, भवनों और सड़कों तक सिमटें 

महात्मा गाँधी मार्ग, एम. जी.  रोड, गाँधी भवन, संग्राहलय, गाँधी वाचनालय तक सिमित रहकर गाँधी जी के विचारों को जन-जन तक नहीं पहुंचा पाई, कांग्रेस अब दुःखी है। स्वच्छता एक बड़े आंदोलन के रूप में विकास की नई गाथा  लिख रहा है। राष्ट्रिय स्वयं सेवक संघ को गाँधी का हत्यारा संगठन बताकर अपनी राह तों आसान की परन्तु गाँधी जी के सिद्धांतों को तरजीह नहीं मिल पाई 

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नमन

विचारों की अब गाथा नए स्वरूप में लिखी जा रही है। आज गाँधी जी की 150 वीं जयंती पर राष्ट्र उनको नमन कर रहा है, आओ संकल्प ले !
स्वदेशी अपनाये ! 
अहिंसा के पथ को स्वीकार करे ! 
सत्य का अनुसरण करे !
सादगी का जीवन जियें !
परन्तु अब देश का बंटवारा न हो ! इसका भी संकल्प करे। 

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पढ़ते रहे प्रवीण भाई की कलम से 

السبت، 29 سبتمبر 2018

सच होते सपने, " प्रधानमंत्री आवास से "

सच होते सपने, " प्रधानमंत्री आवास से "
सच होते सपने, " प्रधानमंत्री आवास से "

एक गीत है " ये तेरा घर ये मेरा घर किसी को देखना हो गर तो पहले आ के मांग ले !" घर को लेकर गीतकरो ने कई गीत लिखें।  नेताओं ने बहुत सपने दिखाए, फिल्म निर्देशक ने "नायक" फिल्म  में झुग्गी-झोपडी के लोगो को एक दिन के मुख्यमंत्री काल में घर दिलावा दिए। सपनों का यह कार्य कभी गरीबों के जीवन में हकीकत बन कर सामने आएगा, ऐसा लगता नहीं था। 2014 चुनावों के पश्चात देश में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  जो योजनाएं भारत भूमि पर हकीकत की दुनिया में उतरी, उसमें "प्रधानमंत्री आवास योजना" की अहम् भूमिका हैं। झुग्गियों में रहकर जीवन यापन कर रहे लोगो को पक्की छत मिली और ' वो तमाम सुविधाएँ जो सामान्य मानवीय जीवन के लिए परम आवश्यक हैं ' जुटाना प्रारम्भ का दी। धीरे-धीरे चले मकान निर्माण की यह शृंखला अब बड़े स्वरूप में हमारे सामने आ रही हैं। किसी भी शहर का समग्र विकास न हो तो बड़ा शहर भी अपनी झुग्गियों को देखकर रोता  नज़र आता हैं। अब शहरों की झुग्गियों का वातावरण पूर्व स्वरुप में न भी बदला हो मगर ग्रामीण क्षेत्रों में पंच-सरपंचों के माध्यम से कच्चे मकानों में बदलाव नज़र आने लगा हैं। 


राजनीति भी तेज़ हो गई हैं 

प्रधानमंत्री आवास योजना के निर्मित घरों में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के चित्रों वाली टाइल्स को दीवालों पर लगाया जा रहा है। इससे उस घर में आवास करने वाले तो गौरव का अनुभव कर रहे है, मगर विरोधियों को उन चित्रों से कष्ट का अनुभव हो रहा हैं। सोशल मीडिया पर कांग्रेस के मित्रों द्वारा इस बाबत टिप्पणियां आने लगी है। वर्षों से यह देश नेहरू, इंदिरा, राजीव के चित्र एवं नामों से उल्लेखित योजनाओं को सहजता से स्वीकार कर रहा है, परन्तु पहली बार पक्के आवासीय मकान बनाकर लोगो के जीवन को खुशहाल और संजीदा बनाने वाले प्रधानमंत्री के चित्र से विपक्ष दुखी हैं। ये देश सन 1975 से "गरीबी हटाओ !" का नारा झेल रहा है। न गरीबी हटी, न गरीब के हालात बदले ! अब जब शासन की विभिन्न योजनाएं सीधे गरीब के बैंक अकाउंट, रसोई में गैस, सर पर छत एवं उत्तम स्वास्थ, शिक्षा  जैसी योजनाओं के साथ बदलाव दिखा रही है, तो विपक्षी आगामी 2019 में भी मोदी के विकल्प के रूप में स्वयं को स्थापित नहीं का पा रहे है। 



स्वच्छता अभियान की भी भूमिका अहम् 

प्रधानमंत्री आवास योजना के साथ-साथ आम नागरिक के जीवन में बदलाव लेन में स्वच्छता अभियान की भूमिका भी महत्वपूर्ण हैं। झुग्गी-झोपड़ियों और गावों में पक्के मकान निर्माण के साथ-साथ शौचालय का भी निर्माण कार्य प्रारम्भ किया गया। स्वच्छता के क्षेत्र में शौचालय निर्माण से भी दूषित वातावरण में कमी आई हैं, सरकारी प्रयासों के साथ-साथ दैनदिन जीवन में जनभागीदारी एवं समाज में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाली सामाजिक संस्थाएं भी आगे आई हैं। इन सबके सकल प्रयासों से हम एक उत्तम राष्ट्र निर्माण की ओर अग्रसर हो पा रहे हैं। 

मानसिकता में बदलाव 

मनुष्य के जीवन जीने की पद्धति में विकास होता है, तो उसकी समग्र सोच भी परिवर्तित होने लगती है। मानसिकता यदि उच्च दिशा की और कार्य करती है, तो व्यक्ति विकासशील हो जाता हैं। सरकारी प्रयास भी उस दिशा में काम करते हैं। प्रधानमंत्री आवास योजना से सिर्फ आवास का बदलाव नहीं सम्पूर्ण मानसिकता का बदलाव किया है। जब व्यक्ति झोपडी से निकलकर पक्के मकान की ओर जाता है, तो वह स्वयं भी विकास के मार्ग की ओर जाने का प्रयास करने लगता हैं। 

"अच्छे दिन आएंगे" जुमला नहीं 

प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने 2014 चुनावों के पूर्व अच्छे दिन आने का नारा दिया था, अब जब हज़ारों मकान बनकर तैयार हैं। आम नागरिकों के मन में पक्के मकान में रहने का सुख अर्जित हो रहा हैं। उज्ज्वला योजना से घरों में गैस कनेक्शन मिल रहे हैं।  बिजली, पानी, सड़क की सुविधाओं में बढ़ोत्तरी हुई हैं। शौचालयों के निर्माण एवं स्वच्छता से से स्वास्थ पर उत्तम प्रभाव पड़ा हैं। प्रधानमंत्री जन औषधि के माध्यम से कम मूल्य पर दवाईयां उपलब्ध कराई जा रही हैं। केंद्र सरकार घोटालों की सरकार न होकर काम करने वाली ईमानदार सरकार हैं। सर्जिकल स्ट्राइक के माध्यम से पाकिस्तान को उसके घर में मारने की हिम्मत सरकार जूता पाई हैं, तो क्या यह अच्छे दिन नहीं ? काम अधूरे है, मगर पुरे होंगे !

सपनो की राह बड़ी होती हैं 

मनुष्य के सपनों की राह बड़ी होती है, जेब भले छोटी हो, चाह बड़ी होती है ! "हाथ से हाथ मिलाकर चल बन्दे हकीकत की राह बड़ी होती है"। 70 साल तक कार्य करने वाली सरकारों ने देश के विकास के लिए कुछ नहीं किया, यह कहना कदापि ठीक नहीं ! जो भी प्रधानमंत्री बने सपने देश के विकास की राह ही चुनी मगर आम व्यक्ति के जीवन में सरकार के निर्णयों का प्रभाव नज़र आये, यह अब सामने आने लगा है ! पहले भी हमने अटल जी को मात्र पाँच साल देकर सत्ता से बहार कर दिया, मुझे लगता है अब ऐसा नहीं होगा ! एक बार पुनः यह सरकार आएगी और 2022 तक जो कार्य पूर्ण करने का स्वनिर्माण प्रधानमंत्री जी ने लिया है, उसें पूर्ण करेगी। 


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खली हुई आँखों से हमने 
सपना सच होते देखा है !

राह कठिन बड़ी थी फिर भी 
मंजिल को छूते देखा हैं !!

आगे दौर कठिन आएगा 
जात-पात पर लड़वाएंगे !

हमकों नहीं भ्रमित होना अब 
मंजिल को पाते रहना है !!

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पढ़ते रहे प्रवीण भाई की कलम से 


الأحد، 23 سبتمبر 2018

पैकेज पध्दति हमारे संस्कार नहीं !

package system
पैकेज पध्दति हमारे संस्कार नहीं !


आज का देखों दोस्तों कल किसने देखा है ?  सरकारी नौकरियों के लिए अब समय निकल चूका है, प्राइवेट नौकरियां एवं स्वयं का व्यवसाय शासन की योजनाओं में शामिल है। मासिक वेतन कितना है ? यह प्रश्न बेमानी सा लगने लगा है। सब एक-दूसरे से पूछतें है, आपका पैकेज कितना है ? पैकेज संस्कृति ने हर व्यक्ति को ठेका पद्धति में लेकर खड़ा कर दिया है। व्यक्ति नौकरियों में अनुशासित होकर काम नहीं कर पाए और काम कराने वाले पर भी काम का दबाव हो तो कार्य पैकेज में अच्छा लगने लगता है।
विदेशों से नौकरियों पर जाने वाले लोगों के बारे में चर्चा सुनते थे, जब डॉलर को रूपए में परिवर्तित कर मेरे बच्चे का अमेरिका में सत्तर लाख रूपए का पैकेज है, कोई कहता है - पचास लाख का पैकेज है तो भारत में नौकरी करने वाले जो मासिक वेतन पर कार्य करतें थे अपने आप को पीछे की पंक्ति का मानने लगे। सरकारी नौकरियां कम होने लगी प्राइवेट नौकरियों में काम के बदले दाम की संस्कृति को बढ़ावा मिला और यहाँ भी पैकेज संस्कृति आ गई और कब संस्करों में घुल गई पता ही नहीं लगा।



सभी व्यवस्थाओं पर लागू 

धीरे-धीरे पैकेज सिस्टम सभी व्यवस्थाओं पर लागू होने लगा शादी में हलवाई, टेंट, लाइट, धर्मशाला हो या ब्यूटी पार्लर आदि सभी कार्य पैकेज सिस्टम में लागू हो गए है। समय का अभाव, भाव-ताव की झंझट और सुविधाओं एवं कम कष्ट में अधिक शौक पूरे करने की जो आदत आज की मानवीय स्थिति में व्यक्ति को पड़ गई है, उसके कारण मनुष्य पैकेज में कार्य देकर निश्चिंता का भाव प्रकट करता है। विगत दिनों एक व्यापारिक मित्र से पूछने पर उसने बताया कि हमारे यहाँ चार्टेड अकाउंटेंट, फॅमिली डॉक्टर का परामर्श एवं कई पारवारिक व्यवस्थाएं पैकेज पर होती है। जिसके कारन काम रुकता नहीं हैं। वार्षिक पैकेज होने से साल में एक बार भुगतान कर संकट से मुक्त हो जाते है।



पूजा-पाठ एवं मंदिरों में पूजा पैकेज 

इन दिनों पूजा पाठ और मंदिरों में भी पैकेज के कारन कुछ लेकर नहीं जाना पड़ता है। पंडित जी फूल-माला, कुंकु, नैवैद्य आदि लेकर सभी व्यवस्थाएं स्वयं जुटा देते है, जिससे भक्तों को  अभिषेख, पूजा, यज्ञ, जनेऊ, विवाह, कर्मकांड सभी के लिए मात्र पैकेज का मूल्य पूछकर भुगतान करना होता है। सेवा के बदले सेवा का यह तरीका मनुष्य को व्यावहारिक बनाने की अपेक्षा क्रियात्मक बना रहा है। 


यह तो हद हो गई 

इन दिनों पकडे पाँच नक्सलवादी संगठन के लोगों ने खुलासे में बताया की हमारे संगठन में आतंक के लिए कार्य नियोजन के लिए पैकेज तय किये जाते हैं। प्रत्येक संगठन अपने नुमाइंदे को निश्चित धनराशि उपलब्ध कराकर निश्चित कार्य सौंपता हैं। पहले भी अपराध जगत में "सुपारी" शब्द का उपयोग किसी की हत्या के पैकेज के रूप में किया जाता था और उस जगत के लोग उसे गर्व का विषय मानते थे। पैकेज तय करते समय उत्तरदायित्व की गंभीरता एवं मन में कार्य करने की हटधर्मिता सबसे महत्वपूर्ण होती है। जिवंत कार्यक्षमताओं वाले जीवट व्यक्तित्व ही पैकेज की महत्ता को प्राप्त करते हैं। 



चिकित्सा के क्षेत्र में पैकेज की सफलता 

निजी चिकित्सालयों ने पैकेज को अभिनव प्रयोग के रूप में लिया और सफल हो गए। राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्टार पर चलने वाले चिकित्सालय समूहों ने ह्रदय, किडनी, कैंसर इत्यादि गंभीर बिमारियों से पीड़ित मरीजों के लिए पैकेज का निर्माण किया। चिकित्सालय में पाँच सितारा संस्कृति में मेडिक्लेम यानि चिकित्सा बीमा का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। पेशेंट को भर्ती कराने के पश्च्यात सम्पूर्ण देखभाल चिकित्सालय द्वारा की जाती हैं। आर्थिक रूप से सक्षम लोगो के लिए यह सब आसान हो गया हैं। 



भविष्य पर प्रभाव 

पैकेज संस्कृति का भविष्य पर प्रभाव कैसे होगा वर्तमान में यह कह पाना संभव नहीं परन्तु इतना तो तय है कि practical life में हम भावनाओ का हनन करते जा रहे हैं।  मानव ATM की तरह मशीनी जीवन जी रहा हैं। give n take की संस्कृति की जुड़वाँ इस पैकेज संस्कृति ने कमाई और सुविधाओं का जरिया तो खोज लिया परन्तु एक-दूसरे के सुख और दुःख में खड़े होकर सेवा भाव से काम करने की जो हमारी संस्कृति थी उसे धूमिल कर दिया है। वास्तु विनिमय से प्रारम्भ होने वाली भारतीय संस्कृति में पाश्चात्य पैकेज पद्धति को स्वीकार तो है परन्तु उसकी सफलता संदेहास्पद ही लगती है। हमें पुनः अपने संस्कारों पर आना पड़ेगा, हम मिलकर काम करने की अपनी पध्दति से ही सुखी रह पाएंगे।  यही हमारी जीवन पद्धति है और यही हमारे संस्कार हैं। 


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الخميس، 13 سبتمبر 2018

विनायक तेरे द्वारे


मैं करूँ नमन "विनायक"
                                    रंग भर दूँ तेरे "द्वारे"

काम और सम्मान अपना है 
                                    न्योछावर तेरे "द्वारे"

रंग कहते है ये "जीवन" नाम 
                                         रंगो भरा हो तेरे "द्वारे"

हर रंग अपने संग सारे          
                                सपनों से भरा पड़ा है तेरे "द्वारे" 

सपने मेरे नहीं छुपे हैं सब 
                                               सतनाम हो तेरे "द्वारे" 

पूर्ण करना मेरी ये विनती 
                                                मैं अर्पण हूँ तेरे "द्वारे"

हे सहारा एक तू ही भगवान 
                                              अब नैया तेरे "द्वारे"

मैं करूँ नमन "विनायक"
                                                  रंग भर दूँ तेरे "द्वारे"

الاثنين، 10 سبتمبر 2018

क्या "तिलक" के स्वप्न को साकार करेंगे ?

LOKMANYA TILAK GANESHOTSAV
क्या "तिलक" के स्वप्न को साकार करेंगे ? 


"तिलक" के स्वप्न को पूर्ण,
                                     कर पाएंगे क्या आज भी !
समरसता के दिव्या मंत्र,
                                     सीखा सके यदि आज भी !!

स्वराज्य प्राप्ति का नारा देकर,
                                 धर्म सह राष्ट्र धर्म साध लिया !
हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई,
                                    सब ने देश का काम किया !!

"गणेशोत्सव" के माध्यम से हम,
                                         दुश्मन से लड़ पाए थे !
सभी धर्मों से तब भी,
                                                गणपति पुजवायें थे !! 

प्रजातंत्र के संस्कारो की,
                                    तिलक ने राह दिखाई थी !
स्वराज्य के अधिकार की,
                                           एक आवाज़ लगाई थी !!

उत्साह हममें आज भी है,
                                       उत्सव को मनवाने की !
संस्कारों को याद रहें सब,
                                          राष्ट्र धर्म संग जाने की !!

الأحد، 9 سبتمبر 2018

क्या उनके लव मैरिज का परिणाम सही है ?

Bollywood love marriage & divorce
क्या उनके लव मैरिज का परिणाम सही है ?
समाज में विवाह नामक संस्कार सदैव प्रासंगिक रहे है और रहेंगे। समाज का कोई भी तबका इस संस्कार से वंचित नहीं रह पाता है। समाज में विवाह करना, धर्म आधारित संस्कारों के अनुसार विवाह करना, जाति के लड़के या लड़की के साथ विवाह करना हमारी जीवन पद्धति का अंग है।
                                                                                                     इन दिनों में भी संस्कारवान परिवारों के लिए यह सामान्य बात है, परन्तु भाग दौड़ भरी इस जिंदगी में जब माता और पिता दोनों पैसा कमाने अपने रोजगार में व्यस्त हो बच्चों को अपने संस्कारों के अनुरूप ढाल पाने में सफल कम ही हो पा रहे हैं। सारे घरों में ऐसा ही हो रहा हैं, यह सोचना सही नहीं है! अपने बच्चों के संस्कारों के प्रति जागरूक रहने वाले परिवारों की संख्या भी कम नहीं हैं। 

अंतरजातीय विवाह की संख्या में वृद्धि 

इन दिनों प्रेम विवाह के मसलों में अंतरजातीय विवाह की संख्या में कई गुना वृद्धि हो गई है। सामाजिक संगठनों में युवा संगठनों की सक्रियता में कमीआई है।  बच्चों का रिश्तेदारी में, सामाजिक कार्यों में आने-जाने में अरूचि एवं प्रत्येक व्यक्ति की व्यवस्था पूर्ण जिंदगी उसका बड़ा कारन है। अंतरजातीय विवाह के के दुष्परिणाम सम्पूर्ण परिवार एवं अगली दो पीढ़ियों पर पड़ते हैं, यह बात समझने में हम सफल नहीं हो पा रहे हैं। कई अंतरजातीय विवाह माता-पिता की सहमति से भी संपन्न होते हैं। उनकी कामयाबी की सम्भावना थोड़ी अधिक होती है। इन दिनों कई समाजों में लड़कियों की संख्या में कमी के कारन भी विसंगतियां उत्पन्न हो रही है, जिससे समाज अंतरजातीय विवाह की और बाद रहा है। ऐसे में प्रेम विवाह में होने वाले अंतरजातीय विवाह को भी मान्यता मिलने लगी हैं।

समाज में प्रभाव एवं पीढ़ी के सामने संकट 

दो अलग-अलग समाज के माता-पिता होने से बच्चों के सामने अपने रिश्तेदारों, संस्कारों, त्योहारों एवं अंततः किस धर्म को मान्यता प्रदान करे, यह संकट सामने आ जाता है। समाज में भी घर में आने वाली बहु के धर्म, समाज एवं संस्कार अलग होने का प्रभाव पड़ता है। 
हमारे यहाँ मुसलमान + ब्राह्मण, सिंधी + राजपूत, कायस्थ + ईसाई धर्म का एक दूसरे से वैवाहिक सम्बन्ध होने से वह समाज में मान्य हो पाना संकट का विषय हैं। कई बार प्रेम विवाह के समय जब माता या पिता इस सदमे को सहन नहीं कर पाने के कारन दम तोड़ देते है तो कई राज्यों में ओनर किलिंग जैसे मसले होकर प्रेमी जोड़ों की हत्या हो जाती हैं। 

उपाय मेरे विचार से 

मेरे अपने अनुभव से मैंने यह जाना है कि प्रेम और विवाह दो अलग-अलग न होकर एक ही है। प्रेम होकर स्वीकार्य विवाह सफल और स्वीकार्य विवाह पश्च्यात प्रेम हो जाए तो भी सफल ! विवाह दो व्यक्तियों का नहीं बल्कि दो परिवारों का नहीं मिलान होता है। पहले कबीलाई संस्कृति में अपने ही समाज के लड़के से अपनी ही रिश्तेदारी में विवाह की परम्परा लम्बी चली आई है। प्रेमी जोड़ो को विवाह करते समय यह सोचना चाहिए की जीवन में प्रेम से भी बड़े रिश्तें और भी हैं। 


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परिवार के संस्कारों को साथ मिलाकर लायेगें !
आओ अब हम दोनों मिल नया संसार बसाएंगे !!

तेरी जाति ऊँची और मेरी जाति नीची क्यों हैं !
ऊँच-नीच के झगड़े में प्रेम मेरा गुम क्यों हैं !!

आओ मानव सिंद्धान्तो से नै रह पर जायेंगे !
प्रेम विवाह किया है फिर भी रस्में खूब निभाएंगे !!



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 पढ़ते रहे प्रवीण भाई की कलम से 

الجمعة، 7 سبتمبر 2018

|| इको फ्रैंडली गणेश ||

Eco Friendly Ganesha
Eco Friendly Ganesha


पर्यावरण की सुध का देखो,
                              आया नया जमाना !
मिट्टी की मूरत अपने घर में,
                              जरूर आजमाना !
प्रकृति सीखा रही है हमको,
                                    मिटटी में मिल जाना !
जीवन में न करो झमेला,     
                                     एक दिन मिट ही जाना !
जहरीले रंगो से देखो,
                                     बिगड़ रहा है पानी !
नकली मिटटी की मूर्ति,
                                  से पुण्य करे है दानी !
आने वाली पीढ़ी को हरा,
                               गुलशन देना है !
इको फ्रेंडली गणेश जी का,
                                ही अब घर में डेरा है !

الخميس، 6 سبتمبر 2018

बंद हुआ कामयाब, लूट गई अर्थव्यवस्था

bharat band
बंद हुआ कामयाब, लूट गई अर्थव्यवस्था !

सुने हैं बाज़ार और लूट गई "अर्थव्यवस्था "
जात-पात की हुई लड़ाई और बिक गई "अर्थव्यवस्था"

उदास चेहरे, खाली गल्ले और चौक है सुने 
नेताओं की सुधर जाएगी इससे "अर्थव्यवस्था"

हिन्दू हित से बदल गई है देश में सारे "रास्ते" 
लूट-पाट में व्यस्त जो थे भटक गए है "रास्ते"

सुना मन है कुर्सी बिन नहीं जैम रही उनकी "व्यवस्था"
देश को बाँट सुख मिल जाये चल रही यही "व्यवस्था"

जो लड़ते दलित लड़ाई कोने में बैठे हैं 
सत्ता के चाबी न होने से हो गई खूब "हसाई"

समझ न आया कैसे बांटे और कैसे "लूटेंगे"
अध्यादेश का मौका मिलता है कोई नहीं "छूटेंगे"

चलना हमको अभी समझ कर और सुध रखना है 
भाई-भाई से हाथ मिलाकर ही हमको चलना है 

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नादान बने क्यों बेफिक्र हो ?

नादान बने क्यों बेफिक्र हो ? नादान बने क्यों बेफिक्र हो,  दुनिया जहान से !   हे सिर पे बोझ भी तुम्हारे,  हर लिहाज़ से !!  विनम्रत...