मंगलवार, 24 मार्च 2020

कोरोना पर योग को संयोग नहीं सुयोग बनाओ


कोरोना पर भारी योगा
कोरोना पर भारी योगा

भारतीय जीवन मूल्यों में धर्म, संस्कार, संस्कृति, परंपरा, आध्यात्म और अपने जीवन मूल्यों पर स्थापित मार्ग पर चलने के परम्परा हैं। इस देश में युगों-युगों से भारतीय नागरिक कैसे होगा  उसका आचरण उत्तम करने के लिए स्वच्छ मन और पवित्र आत्मा की आवश्यकता होगी यह सभी को बचपन से समझाया जाता है। 


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हम जिन जीवन मूल्यों की अपनाते है उन मूल्यों का आधार मात्र धर्म नहीं बल्कि धर्म की स्थापना और उससे जुड़े कुछ ऐसे आधारभूत बातें होती हैं जो धरातल पर व्यावहारिक लगने में कठिन हो पर जिसने उन सभी बातों को अंगीकार कर लिया उसका जीवन सही मार्ग पर चलता नहीं बल्कि दौड़ने लगता है।  प्रकृति जन्य सुखों से भरा स्वयं के जीवन मूल्यों से अंतर मन एवं आंतरिक शरीर से सुखों का एक मार्ग हैं जिसे राम, कृष्ण, शिव एवं शक्ति सभी मानते हैं। वह हैं "योग"  आजकल जिस योगा भी कहा जाता हैं।  भोग विलास और पाश्चात्य जीवन पद्धति की ओर दौड़ते इस युग में प्रत्येक व्यक्ति योग की अपेक्षा मेडिक्लेम और उससे जुडी बीमा पॉलिसी  लेकर सुरक्षित महसूस करने का प्रयत्न करता हैं परन्तु मेरे शरीर में इतना सुख हैं की मैं योग के माध्यम से ईश्वर की भक्ति, आत्म संतुलित और स्वास्थ्य का अनुपम भंडार प्राप्त कर लूंगा यह सोच व्यक्ति के मन में आती ही नहीं हैं। 

कुछ दिनों पूर्व एक जैनाचार्य जी के मार्गदर्शन में मैंने सुना था कि आजकल व्यक्ति सुबह उठकर सबसे पहले देखता हैं की मेरा मोबाइल चार्ज  हैं की नहीं वह यह नहीं देखता की मैं, मेरा शरीर मेरी आत्मा और जीवनचर्या की योजना चार्ज हैं या नहीं।  भौतिक सुखों की होड़ जिंदगी को हरा रही हैं।  ऐसे में व्यक्ति का स्वयं चार्ज होना जरुरी हैं।  जीवन के इस कठिन पथ पर पग -पग पर चुनौतियाँ हैं।  हमें इन चुनौतियों से लड़ने के लिए सिर्फ शरीर नहीं आत्मबल को मजबूत बनाना पड़ेगा।  पाश्चात्य पद्धति की जिम में संगीत की मधुर ध्वनि के साथ पसीना बहा कर बॉडी मेंटेन करने से शरीर सौष्ठव तो हो जाता हैं, पर शरीर और मन का लचीलापन जो योग के माध्यम से प्राप्त होता हैं जिम में संभव नहीं हैं। हमारी सन्त परम्परा में भी इसका उल्लेख हैं। 


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फिट इंडिया 

भारतीय संत परम्परा में ग्रंथो पर आधारित तथ्यों के अलावा पतंजलि योग पीठ के माध्यम से बाबा रामदेव ने मिडिया, सोशल मीडिया, कैंप, प्रचार-प्रसार आदि को माध्यम बना कर योग को घर-घर तक पहुँचाने में कामयाबी प्राप्त की। भारतीय धर्म शास्त्रों में योग को सदैव आधार बनाया गया हैं। ऐतिहासिक प्रमाणों से यह कहा जा सकता हैं कि भारतीय सांस्कृतिक दर्शन हैं जो सम्पूर्ण विश्व को मार्गदर्शन प्रदान कर रहा हैं। 




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पतंजलि योग सूत्र 

आज हम covid 19 वायरस कारण कोरोना नामक बीमारी से वैश्विक महामारी से झुझ रहे हैं।  संक्रमणकारी यह रोग जिस स्थिति से विश्व के अन्य देशों को प्रभावित कर रहा हैं, ऐसा भारतीय वातावरण में नहीं हैं। सरकार के सजगता के साथ भारतीय नागरिको के पास प्रकृति जन्य साधन जैसे आयुर्वेद का काढ़ा, नीम, तुलसी, एलोवेरा, नीम्बू , आंवला, चिरायता जैसे औषिधियाँ हैं। वहीं योग के माध्यम से अपनी श्वसन क्रिया पर नियंत्रण करने वाले अनुलोम-विलोम, कपाल भारती, भ्रामरी, सूर्यनमस्कार जैसी योगिक एवं व्यायाम की क्रियाएं हैं।  जिससे शरीर को एवं योग साधना के माध्यम से चित एवं मन को एकाग्र कर आत्मा शुद्धि का कार्य किया जाता हैं। 



कुंडलीनी को जागृत करना योग को विशिष्ठ शैलियों में आता हैं जिससे मनुष्य देवत्व की ओर अग्रसर होता हैं।  अभी हमें योग की उस स्थिति का चिंतन नहीं करना हैं क्यूंकि भागदोड की इस जिंदगी में सहज साधना से जन साधारण के मानस तक पहुँचाने वाली बातों को ही करना महत्वपूर्ण होता हैं। देश का नागरिक जिन सामान्य नियमों में चलकर स्वयं का उध्दार कर सके उतना ही काफी होता हैं। 



योग शब्द का अर्थ सम्बन्ध या मिलन जुड़ाव होता हैं। दर्शनशास्त्र में योग का अर्थ जीवात्मा और परमात्मा का मिलन "योग" हैं।  भारतीय परम्परा में पतंजलि ने योग सूत्र की रचना  हैं। समय-समय पर सभी ने अपनी व्याख्या के अनुसार योग के बारे में कहा हैं, जिसमें गोस्वामी तुलसीदास, कबीर, गुरु गोविन्द सिंह, जैन-बौद्ध धर्म के विभिन्न रचनाकारों ने इसे अपनी विचारधारा के अनुसार रचा हैं। 






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YOGA AT HOME 

योग मात्र अक्षरों से रचा एक शब्द नहीं बल्कि विश्व को एक सूत्र में बांधने वाला एक बंधन हैं। भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र संघ में 21 जून को योग दिवस घोषित करने की बात स्वीकृत कराकर भारत को पुनः विश्व गुरु का दर्जा प्राप्त हो उस ओर कदम बढ़ाया हैं। भारतीय शिक्षा एवं संस्कृति जिसमें शून्य की खोज से लेकर आयुर्वेद की श्रुश्रुत एवं चरक सहिंता हो या योग दर्शन एक नया मार्ग प्रदान किया हैं। 



पाश्चात्य संस्कृति की भागदौड़ भरी जिंदगी से आध्यात्म की ओर बढ़ने की परम्परा को श्री श्री रवि शंकर ने विश्व के कई देशों तक पहुँचाया।  आर्ट ऑफ़ लिविंग के माध्यम से अपनी जीवन पद्धिति में सुख और आनंद की अनुभूति का मार्ग बताया हैं। 



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श्री श्री रविशंकर जी 
आइये हम सभी मिलकर भारतीय संस्कारों के इस अद्भुत खजाने का आनंद लें। खुशियों को भौतिक वस्तुओं में तलाशने की अपेक्षा अंतरमन में खोजें। सुख कही और नहीं हमारे अंदर है। ईश्वर कही और नहीं हमारे मध्य हैं। चित्त और मन की एकाग्रता ही योग हैं।  विश्व की यह भयानक बीमारी हम अपने अंदर प्रवेशित न होने दे।




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meditation






योग को संयोग नहीं सुयोग बनाओ। 
अपने अंगो को सुडोल और मजबूत बनाओ।

जीवन में श्वसन पर नियंत्रण जरुरी। 
अनुशासन के साथ संयम से भी न बने कोई दुरी 

आज मिलकर अपना सुख अपनाएँ। 
योग को अपनाकर दुःख को दूर भगाएँ  

बुधवार, 14 अगस्त 2019

रक्षा का संकल्प मातृभूमि से करना चाहिए !

रक्षा का संकल्प मातृभूमि से करना चाहिए !
रक्षा का संकल्प मातृभूमि से करना चाहिए !



रक्षा का संकल्प, मातृभूमि से करना चाहिए !
गौरवशाली इस धरा को, गौरवपूर्ण करना चाहिए !!

आज़ादी अधिकार हमारा, लगता प्राणों से प्यारा हैं !
फिरंगी को देश से भागकर, फिर तिरंगा लहराया है !!


रक्षा का संकल्प मातृभूमि से करना चाहिए !
माताओं ने दे दी क़ुरबानी अपने लालों की 



माताओं ने दे दी क़ुरबानी, अपने लालों की !
समझ न पाया देश हमारा, बातें फुट-बंटवारे की !!

गाँधी जी ने मार्ग अहिंसा का, यूँ ही अपनाया था !
जवानों की क़ुरबानी को, अपने मन से नकारा था !!


रक्षा का संकल्प मातृभूमि से करना चाहिए !
मातृ भूमि को वीरों और शहीदों का सम्मान मिला !

जंग ए आज़ादी को हर तरफ से मान मिला !
भारत भूमि को वीरों और शहीदों का सम्मान मिला !!

मात मिली हैं हमकों, सदा अपने ही गद्दारों से !
रहा देश का मान, "तिलक" "भगत" के वारों से !!

रक्षा का संकल्प मातृभूमि से करना चाहिए !
रक्षा का संकल्प मातृभूमि से करना चाहिए !



सुन्दर चित्रण नहीं गुलामी, सदा हम यूँ याद करे !
जियें प्रतिदिन देश की खातिर, विश्व में सम्मान बढ़े !!

आज दिन है संयोगी, समय प्रेम की धारा का !
सुबह बढ़ाओ मान देश का, दिनभर वीरां प्यारे का !!


रक्षा का संकल्प मातृभूमि से करना चाहिए !
सुबह बढ़ाओ मान देश का, दिनभर वीरां प्यारे का !


मान बढ़े अभिमान बढ़े, बढ़े प्रेम की रसधारा !
रक्षासूत्र बांधे बहना और तिलक लगाए प्यारा सा !!

संस्कारों की इस धरा पर, आज उठी अंगड़ाई हैं !
धरती के इस स्वर्ग को पाकर, भारत माता भी मुस्काई है !!

शनिवार, 10 अगस्त 2019

अब पाक की बारी है !

अब पाक की बारी है !
अब पाक की बारी है !

कश्मीर के पंडित को, भारत ने पुरा देश दिया !
जवाहर को पी.एम. बनाकर प्रेम का सन्देश दिया !!

अब पाक की बारी है !
अब पाक की बारी है !

मिली निराशा भारत को, पाक को कश्मीर (अधिकृत ) मिला! 
अखंड भारत के सपने को, गाँधी ने चकनाचूर किया !!

अब पाक की बारी है !
अब पाक की बारी है !


सत्तर साल लगे है, अपनों को गले लगाने में !
आतंक के खतरे को, धरती के स्वर्ग से हटाने में !!

अब पाक की बारी है !
अब पाक की बारी है !


दो परिवारों ने मिलकर, कश्मीर पर  राज किया !
दिल में पाक का झंडा लेकर, भारत से पूरा छल किया !!

अब पाक की बारी है !
अब पाक की बारी है !

कश्मीरी पंडितो को घर पर, अब ले जाना है !
टूटे हुए मंदिरो पर, भगवा फिर लहराना है !! 

अब पाक की बारी है !
अब पाक की बारी है !

लद्दाख के बासिंदों को, उनका हक़ दिलवाना है !
कश्मीर है भारत का स्वर्ग, दुनिया को दिखलाना है !! 

अब पाक की बारी है !
अब पाक की बारी है !

कश्मीर में खुशहाली और चेतना फिर से आएगी ! 
नर्क बने इस कश्मीर को फिर से स्वर्ग बनाएगी !! 

अब पाक की बारी है !
अब पाक की बारी है !

अमित भाई है अब गृहमंत्री, और मोदी की बारी है !
कश्मीर तो मिला लिया , अब पाक की बारी है !!


मंगलवार, 30 जुलाई 2019

नारी के प्रति बदलाव जरुरी

नारी के प्रति बदलाव जरुरी 

भारतीय लोकतंत्र भारतीय चिंतन, धर्म, सामाजिक मूल्यों, परम्पराओं, सम्मान और स्वाभिमान लिए जाना जाता है। विगत कुछ वर्षों में भारतीय राजनीति ने देश को शर्मसार किया हैं।                                                                                             भाषा की सुचिता समाप्त हो रही हैं। जाति, धर्म, भ्रष्टाचार, दुराचार यह चुनावी राजनीती में आने लगे तब तक जनता समझ नहीं पाई जी इसका अंत कहाँ हो ये कब तक बढ़ता रहेगा। सामान्य बातचीत में हम कहते हैं कि राजनीति बहुत बुरी जगह हैं। घर से निकलकर समाज के लिए कुछ करने का जज्बा है तो हमें राजनीति को छोड़कर सोचना चाहिए परन्तु दूसरी ओर यह भी कहते है कि जब तक अच्छे लोग राजनीति में नहीं आयेंगे। राजनीति स्वच्छ कैसे होगी।  
महत्वकांक्षा के इस युग में सत्ताधारी दल के इर्द-गिर्द महिलाओं का आना ओर शॉर्टकट से ऊपर पहुंचने की होड़ में राजनीति की गंदगी को सडकों पर लाकर खड़ा किया हैं। सोशल मिडिया के इस युग में मिनटों में आपके चित्र वीडियो और समस्त अश्लीलताएं समाज के बीच होती हैं। सबको लगता हैं राजनीति एक ऐसा माध्यम हैं जो सम्मान और सम्पदा दोनों देगा और शायद देता भी हैं परन्तु क्या सम्पूर्ण राजनीति गलत दिशा की ओर ही जा रही है। पता नहीं विचारणीय प्रश्न है !

नारी के प्रति बदलाव जरुरी
नारी के प्रति बदलाव जरुरी 

तीन तलाक़ बिल पास हुआ।  

तीन तलाक़ बिल पास हुआ महिलाओं के संरक्षण और उन्हें हलाला जैसी जिल्लत भरी जिंदगी से मुक्ति के लिए प्रयासों को सराहा जाना चाहिए। इस्लाम और इस्लामियत के नाम पर चार-छः बच्चे पैदा करके शौहर दूसरी बीवी तो कभी तीसरी बीवी ले आता था। जिस समाज में औरत को उपभोग की वास्तु समझा जाता है ऐसे वहशी समाज में यह बिल एक ऐतिहासिक पहल सिद्ध होगा औरत सिर्फ घर सजाने की नहीं धर्म, संस्कार और एक ही जगह दो घरों का सम्मान बढ़ाने वाली संस्था हैं। हम आज जब नारी समाज की बात करते हैं तो सिर्फ मुस्लिम समाज से ही जोड़कर देखा जाना उचित नहीं किसी भी धर्म मजहब और समाज में स्त्री सम्मान की महत्ता बहुत आवश्यक होती है। आज हम तलाक़ और हलाला से मुक्ति और इसे आपराधिक श्रेणी में लेकर महिलाओं के सम्मान में इज़ाफ़ा कर रहे हैं।  
नारी के प्रति बदलाव जरुरी
नारी के प्रति बदलाव जरुरी 

संसद भी अछूती नहीं। 

भाषा की सुचिता से देश की संसद भी शेष नहीं रही है। जिसके मन और वाणी में जो विचार आ रहे है, वह उदगार प्रकट कर रहा है। वर्तमान में आज़म खाँ की टिप्पणी ने लोकसभा में हंगामा कर रखा हैं।  जाति, धर्म,समुदाय और नारी सम्मान के विषय पर जन प्रतिनिधियों को तो कम से कम भाषा एवं विचारों पर नियंत्रण करना ही चाहिए। यदि महिलाये अपने घर से निकलकर देश, समाज के लिए कुछ करना चाहे तो उन्हें एक सम्मानपूर्ण आधार मिलना ही चाहिए। समाज में स्त्रियों को आज भी हीन भावना से देखा जा रहा हैं। 

पत्नी पर पति भारी हर जगह 

महिला सशक्तिकरण की दिशा में हम समाज को कितना भी आगे बढ़ाये, निचलें स्तर तक सुधार में लगभग २० वर्ष और बीत जायेंगे। सरपंच, जनपद, जिला पंचायतों, मंडी अध्यक्षों के लिए सीट आरक्षित कर महिलाओं को समाज तो चुन लेता मगर उनके पति सम्पूर्ण व्यवस्था का संचालन करते हैं। स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त करने वाली महिलाओं के पतियों के हाथों में ही मैंने सत्ता की चाबी देखी हैं।  जब कोई पति अपनी पत्नी के प्रगति के मार्ग को सहजता से नहीं देखता तो स्वच्छ रूप से निर्णय लेकर नारियाँ कब समाज में अपना स्थान बनाएगी। इतिहास में कई ऐसे उदाहरण है जिसमें पुरुषों से अधिक महिलाओं ने काम को बेहतर अंजाम दिया हैं, परन्तु पुरुष मानसिकता का यह समाज अभी परिपक़्व नहीं हैं। एक दो गलत स्त्रियों के कारण सम्पूर्ण स्त्री वर्ग को कटघरे में खड़ा नहीं किया जा सकता हैं। आज़ादी सभी का मौलिक अधिकार है और उसका सम्मान किया जाना चाहिए। 
नारी के प्रति बदलाव जरुरी
नारी के प्रति बदलाव जरुरी 

स्त्री शिक्षा पर बल

> बदलाव के इस दौर में स्त्री शिक्षा के सन्दर्भ में समाज में जागरूकता बढ़ी हैं और ग्रामीण क्षेत्रों में इसका असर नज़र आने लगा हैं। शिक्षा से समाज का बदलाव होगा ऐसा भी सोचना १००% उचित नहीं। दरअसल आधुनिकता का एक अजीब रूप सामने आ रहा हैं जो बातें विचारों के माध्यम से बदलाव का कारन होना चाहिए वही बनते मात्र मोबाईल, कपड़ो, वाहनों के संचालन तक सिमित रह गई है। आधुनिकता का तात्पर्य हम मानसिकता से बदलना चाहते है, मगर महिलाओं को लेकर समाज की मानसिकता आज भी जस की तस हैं। 



विशाल हृदय की आवश्यकता 

सम्पूर्ण समाज को महिलाओं को लेकर विशाल हृदय, भरोसेमंद व्यव्हार एवं सम्बल की जरुरत लगती हैं। औरत यानि बेचारी, अबला कमजोर नहीं बल्कि नौ माह तक कोख में रख जन्म देने वाली माँ से लेकर अंग्रेजों से मुकाबला करने वाली झाँसी की रानी तक है। संसद में आज तक महिला आरक्षण बिल पास नहीं हो पाया।  मुस्लिम समाज तीन तलाक़ और हलाला जैसे मुद्दे पर घिरा हैं वहीं ईसाई समाज भी ननों के मसले पर कटघरे में हैं। नारी उपभोग की वास्तु नहीं हमारी जन्मदात्री हैं। हम अपनी पुरुष प्रधान मानसिकता से बहार नहीं आ पा रहे है। कई समाजों में पर्दा प्रथा अब भी जारी है। दहेज़ के मुक़दमे आज भी दर्ज हो रहे है। अपमान का यह दंश मातृशक्ति को कब तक झेलना पड़ेगा ? चिंतन का विषय हैं। 

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लक्ष्मी हो तुम, तुम ही हो सरस्वती !
माता यशोदा हो, तुम्ही हो धर्मिणी !!
नाज़ है तुमपे, शान है तुझसे !
हम सबके अरमान है तुमसे !!

सोमवार, 22 जुलाई 2019

कमजोर विपक्ष - डूबते मुद्दे

कमजोर विपक्ष - डूबते मुद्दे
कमजोर विपक्ष - डूबते मुद्दे  

जनतंत्र में पक्ष एवं विपक्ष की भूमिका बराबर की न सही किन्तु समय पर मुद्दों की बहस तो होनी ही चाहिए। भारतीय राजनीति में सबसे पुरानी पार्टी का अहंकार रखने वाली कांग्रेस आज जनता के महत्वपूर्ण मुद्दों से अनभिज्ञ हैं। आज सरकार ने बेरोजगारी दूर करने के प्रयासों के लिए कई योजनाये शुरू की पर जमीनी हक़ीक़त कुछ ओर होती हैं। सांसद, विधायक एवं अन्य जान प्रतिनिधि कभी भी बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर जनता से रूबरू नहीं होतें। सरकारी एवं निजी क्षेत्रों में नौकरिया कम करने के प्रयास जारी हैं। जनता के बीच सरकारी नौकरी की चाह सदैव जोर पकड़ती रहती है। काम कम, पैसे ज्यादा, जीवन सुरक्षित यह तीन मंत्रो पर आधारित सरकारी नौकरी आसान नहीं परन्तु निजी क्षेत्र भी सदैव अपने व्यवसाय को सुरक्षित और संरक्षित करने के लिए कर्मचारियों के मुद्दे पर जनहित एवं समाज विकास की बात कभी नहीं सोचते। 


कमजोर विपक्ष - डूबते मुद्दे
कमजोर विपक्ष - डूबते मुद्दे  


असफल होते सरकारी प्रयास 

सरकार ने स्टार्ट-अप योजना, मुद्रा लोन, मुख्यमंत्री-प्रधानमंत्री के नाम पर युवाओं को व्यवसाय स्थापित कर स्वयं के पैरों पर खड़े होने के प्रयत्नों का दावा किया जा रहा है। सरकारी योजनाओं की रचना और उसके क्रियान्वयन में बहुत बड़ा अंतर होता है।  इन सारी योजनाओं को हकीकत में लाने के लिए बहुत बड़ी भूमिका बैंकों की होती है, परन्तु बैंक अधिकारी इन योजनाओं को अपने यहाँ स्थित खाताधारकों को जो व्यापार-व्यवसाय में पूर्व से संलग्न है, के माध्यम से आंकड़ों को पूरा करते हैं। 

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" सरकार मनरेगा की स्किम को भी बंद कर सकती है " यह कहकर आने वाले समय का संकेत दिया हैं।  बेरोजगारी सिर्फ आर्थिक समस्या नहीं है इस परिस्थिति में रहकर युवा अपने मूल कार्य से भटक कर गलत मार्ग का चयन कर लेते है।  अंगेजों से लड़कर आज़ादी प्राप्त करके भी हमने हासिल क्या कर लिया।  देश का बंटवारा, आरक्षण का ज़हर, मेकाले की शिक्षा पद्धिति समाज तो उसी दिशा में चल रहा हैं, जिस ओर अंग्रेज ले ले जाना चाह रहे थे। पक्ष और विपक्ष संसद में बैठकर नूरा-कुश्ती की लड़ाई लड़ता रहता है। जन सामान्य की अड़चन बढ़ रही है। बदलाव किसी बाजार से नहीं ख़रीदा जा सकता है, कि हम विदेशों से आयत कर लेंगे। देश में बदलाव के निर्णय सरकारी प्रयासों और साहस पर निर्भर नहीं हों सकते हैं।  अब समय जन भागीदारी का भी हैं, मगर बेरोजगारी, नौकरियों की व्यवस्था, व्यवसाय का निर्धारण यह सब मात्र सरकारी प्रयासों से निर्मित योजनाओं और उनके उचित क्रियान्वयन पर निर्भर करता हैं। वातानुकूलित कमरों में बैठकर बनाई जाने वाली योजनायें जमीनी स्तर पर कितनी कामयाब होगी यह चिंतन का विषय  हैं। 


कमजोर विपक्ष - डूबते मुद्दे
कमजोर विपक्ष - डूबते मुद्दे  

अपराधों में कमी आएगी !

जब युवाओं को समय पर उचित रोजगार, बेहतर शिक्षा व्यवस्था एवं विश्व स्तरीय जीवन-यापन की सुविधा अर्जित नहीं नहीं होती है तो महत्वाकांक्षा के इस युग में जब हम मोबाइल और इंटरनेट के माध्यम से विश्व को जोड़ने की बात कर रहे हैं और वो जुड़ भी रहा हैं तो ऐसे में हम उनका जीवन स्तर ऊँचा करना ही होगा। आज जमाना एक चलती हुई बस की सवारियों की तरह हैं जिसे सीट वो खड़ी हुई सवारी को सीधे खड़े रहने की सलाह दे रहा हैं।  एक-दूसरे की तकलीफों को समझने का समय नहीं रहा। चुनावी वारों की फेहरिस्त लम्बी होती चुनाव में खड़ा उम्मीदवार भी नहीं पड़ता और वर्तमान समय में हारा हुआ कमज़ोर विपक्ष जिसके मजबूत होने की कोई सम्भावना नहीं है। सबके ऊपर भ्रष्टाचार के बहुत से मामले है, वे सरकार के सामने चुनौती बनकर कड़ी समस्याओं के मामले में क्या बहस करेंगे। हरे हुए सेनापति के साथ कोई सिपाही नहीं होते। सरकारी प्रयत्न जारी हैं। 


कमजोर विपक्ष - डूबते मुद्दे
कमजोर विपक्ष - डूबते मुद्दे  

हमें क्या करना हैं ?

हमें अब सरकार और विपक्ष की अपेक्षा अपने स्वयं के बल पर ही मार्ग खोजना चाहिए। कोई हमें रास्ता दिखाये उसके बजाये हम स्वयं अपनी रह चुने। सरकारी योजनाओं का लाभ लेने का प्रयत्न करें पर उस पर निर्भर भी न रहे। भारत संभावनाओं का देश है, यहाँ एक रास्ता बंद होता है तो चार नए मार्ग मिल जाते हैं। युवाओं को अपने माता-पिता के संस्कारों की चिंता कर रोजगार के लिए उचित दिशा का चयन करना चाहिए। आज का युवा ही असली भारत हैं.यही हमारी संपत्ति है और यही हमारा आने वाला कल हैं। 

रविवार, 21 जुलाई 2019

सुख और आनंद का रमणीय स्थल " श्री सुखानंद तीर्थ "

" श्री सुखानंद तीर्थ "
श्री सुखानंद तीर्थ 
राजस्थान और मध्यप्रदेश की सीमा पर  स्थित पर्वत श्रेणियों में " श्री सुखानंद तीर्थ " एक बहुत ही रमणीय स्थान हैं।  यह जावद नगर से लगभग १३ किलोमीटर दूर हैं। यहाँ पहाड़ियां कोण बनाती हुई स्थिति में हैं।  यहाँ का प्राकृतिक दृश्य बहुत ही मनोरम है जो हजारों सैलानियों को प्रतिवर्ष आकर्षित करता हैं। 


राजा आनदपाल द्वारा विक्रम सम्वत ५ में ( ५२ ईस्वी पूर्व ) इस स्थान की खोज की गई। 


सुख और आनंद का रमणीय स्थल " श्री सुखानंद तीर्थ "
सुख और आनंद का रमणीय स्थल " श्री सुखानंद तीर्थ "


उज्जयिनी ( उज्जैन ) से लेकर शिवलिङ्ग ग्राम तक विस्तीर्ण भू-भाग " शिवभूमि " हैं, जहाँ हजारों शिव मंदिर बने हुए है। इस भाग में प्रसिद्ध स्थल है - उज्जयिनी में महाकाल, दशपुर ( मंदसौर ) में पशुपतिनाथ, अरनोद (प्रतापगढ़) में गौतमनाथ, बांसवाड़ा अरथूना एवं त्रिपुर सुंदरी, चित्तौड़ के किले की शिव प्रतिमा एकलिंग जी में एकलिंग जी का प्राचीन देवालय इनके अतिरिक्त अन्य अनेक पवित्र और आकर्षक स्थान हैं। 


श्री सुखानंद तीर्थ - उन्ही में से एक पावन तीर्थ है जो श्री शुकदेव मुनि को तपश्चर्या से स्वयं तीर्थ रूप था।  यह स्थान सुन्दर रमणीय पहाड़ों और चन्दन वन के बीच हैं।  चारों ओर प्राकृतिक सौंदर्य का अनूठा दृश्य आगंतुकों  को प्रफुल्ल कर नई स्फूर्ति देता हैं। जगत प्रसिद्ध श्री वेदव्यास पुत्र महामुनि श्री शुकदेव ने इस स्थान की रमणीयता एवं शांत वायुमंडल से प्रसन्न होकर यहाँ पर तपस्चर्या की थी तब से ही यह स्थान एक महान तीर्थ बन गया हैं। 

                         यहाँ के पर्वतीय गर्भ भाग से अविरल प्रवाहिन होने वाली गंगा श्री शुकदेवमुनि द्वारा लाई गई, उनकी तप सिद्धि का फल हैं। जो " शौकी गंगा " के नाम से प्रचिलित हैं।  यह स्थान ऊँची पहाड़ियों के मध्य में स्थित हैं, जहाँ सीढ़ियों की लम्बी क़तार चढ़कर पहुंचना होता है।  यहाँ के झरनों से १९ मीटर ( लगभग ६१ फ़ीट ) की ऊंचाई से बारहों महीने पानी गिरता हैं।  अपने मृतक परिजनो का अस्थि प्रवेश करने के लिए दूर-दूर के अनेकों शृद्धालु जन भी यहाँ बहुत मात्रा में आते हैं। 

विक्रम सम्वत्  १७२४ (सन् १६६६ ई. ) में जब छत्रपति शिवजी औरंगजेब की कैद आगरा से दि. २९ अगस्त १६६६ ई. को गायब होकर दक्षिण भारत गए तब कहते है वे महापुरुष इस स्थान पर ठहरकर गए थे। 



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जगत प्रसिद्ध श्री वेदव्यास पुत्र महामुनि श्री शुकदेव
महामुनि श्री शुकदेव 

विक्रम की ग्यारवहीं शताब्दी में दसनाम तिलक महान संत श्री बालगिरिजी महाराज ने यहाँ मठ-मंदिर आदि निर्माण कराकर प्राकृतिक-शिवलिंग तथा अपनी आचार्य परंपरा के सप्तम आचार्य श्री शुकदेव मुनि प्रतिष्ठा मिटी श्रावण शुक्ल ५ सोमवार ११६५ वि. को करवाकर इस तीर्थ को मूर्त रूप दिया जो आज जीर्ण-शीर्ण दशा में अवस्थित होकर भी प्रसिद्धि को प्राप्त है। 

मन्दिर निर्माण कार्य प्रारम्भ ११६२ विक्रमी ( सन् ११०५ ई. ) में हुआ तथा सम्वत ११७२ विक्रमी ( सन् १११५ ई. ) में पूर्ण हुआ। 


सौजन्य से :- श्री मनोहरदास अग्रवाल ( श्री सुखानंद तीर्थ परिचय पुस्तक के संपादक )

शुक्रवार, 29 मार्च 2019

स्त्री शक्ति की उपयोगिता आवश्यक !

स्त्री शक्ति की उपयोगिता आवश्यक !
स्त्री शक्ति की उपयोगिता आवश्यक !


स्त्री यानि त्याग की प्रतिमूर्ति कहने सुनने में यह पुस्तक में लिखा शब्द लगता हैं। प्रकृति में स्त्री और पुरुष में भेद करते समय बल पुरुष को, सहनशीलता स्त्री को, दी उन्होंने सोचा भी नहीं होगा की पुरुष का यह बल स्त्री की रक्षा की अपेक्षा उस पर अन्याय करने में कई लोग उपयोग करेंगे और स्त्री की सहनशीलता उसका बल होने की अपेक्षा उसे कमजोर करेगा। आज बदलते परिवेश में स्त्री पुरुषों के बीच समानता नजर तों आ रही है परन्तु उसके अधिकार को स्वीकार नहीं कर पाया है यह समाज ! मैंने अपने व्यक्तिगत अनुभव से भी यह देखा की समाज में ३३ % आरक्षण के पश्चात सरपंच, विधायक एवं अन्य पदों पर स्त्रीयों की नियुक्ति या तो हुई पर प्रतिनिधि के तौर पर उनके पति अपनी राजनिति को चमकते रहते है। मैंने अपने निजी अनुभव में एक महिला चिकित्सक को अपने पति से डरते हुए देखा है पति ने कह दिया इतना बड़ा नर्सिंग होम लेकर बैठे हैं, बड़ा स्टाफ है, चार सोनोग्राफी, तीन ऑपरेशन नहीं हुए तो आर्थिक व्यवस्था संभव नहीं, दर में वह महिला चिकित्सक न चाहते हुए भी अपने पेशेंट को आर्थिक हानि पहुंचती है,कचोटता हुआ उनका मन उनके उदास चेहरे पर साफ नजर आता है। 

स्त्री शक्ति की उपयोगिता आवश्यक !
स्त्री शक्ति की उपयोगिता आवश्यक !


समाज में स्त्री उदारता के भाव उत्त्पन्न तो हुए है, पर मन अभी यह स्वीकार नहीं कर पा रहा है।  तेज़ स्वाभाव वाली स्त्रियाँ  भी समाज में हैं। कहते है, पुरुषों का एक संगठन पत्नी पीड़ित का भी हैं परन्तु यह कम नज़र आता हैं। 







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स्त्री की शत्रु स्त्री भी होती है 

घर, परिवार, समाज में नारी सम्मान का यह प्रश्न स्त्री-पुरुष के मध्य तो है परन्तु कई परिवारों में रिश्तों की दरार, वर्चस्व की लड़ाई, प्रतिस्पर्धा का भाव और तेरा-मेरा करने की प्रकृति से एक औरत ही औरत की शत्रु बन जाती है। व्यावहारिक जीवन की विषमताएँ  घर से ही प्रारम्भ होती है। उसका प्रभाव धीरे-धीरे समाज पर पड़ता जाता है।  आज बदलते परिवेश में घरेलु प्रकरणों में कमी आई है।  इसका प्रमुख कारन शिक्षा और समाज में बढ़ती जागरूकता है। बेटे-बेटी में अंतर करने वाला यह समाज कब बहु को बेटी के रूप में स्वीकार कर पाएंगे यह विचारणीय प्रश्न है।


स्त्री शक्ति की उपयोगिता आवश्यक !
स्त्री शक्ति की उपयोगिता आवश्यक !

बेटियाँ निभा रही है, बेटों की भूमिका 

समाज में बदलाव इस कदर आ गया है कि वंश बेल की चाह में सात बेटी तक इंतज़ार करने वाले युग में बदलाव आ गया है। बेटियाँ बेटों के रूप में अपने माता-पिता की देखभाल कर रही हैं। सम्पत्ति में अधिकारों का जीवन हर क्षेत्र में कर्तव्य निभाकर, बेटियां अपने आप को सिद्ध कर रही है। 

स्त्री दिवास तक सम्मान सिमित नहीं 

नारी शक्ति के सम्मान की परम्परा युगों से चली आ रही है, इसे बरक़रार रखना चाहिए। हम पुरुष प्रधान समाज में नारी का अपमान कर स्वयं को कुछ समय तो सिद्ध  लेते है परन्तु जब चिंतन करेंगे तो पाओगे की हमारे लिये पल-पल जीने वाली नारी कभी स्वयं के  सोचती। घर परिवार में बच्चे, पति, बड़े-बुजुर्ग सभी के पश्चात् भोजन करने वाली नारी जिस दिन पुरुष मानसिकता की तरह जीने लग जाएगी तभी पता चलेगा पुरुष को की हम क्या प्राप्त कर रहे है और हमें क्या करना चाहिए। 

स्त्री शक्ति की उपयोगिता आवश्यक !
स्त्री शक्ति की उपयोगिता आवश्यक !

स्वयं सिद्ध बनना होगा नारी को 

स्त्री स्वयं को सिद्ध कर पाने में सक्षम होकर भी सदैव मुँह उठाकर पिता, पति, भाई व भाई की ओर तकती रहती है। समाज में परित्यक्ता नारियों की संख्या अब बड़ी मात्रा में बढ़ने लगी है। प्रसन्नता भी होती है, यह देखकर कि लड़ने की प्रवृति ने स्त्री को स्वयं सिद्धा बनाने में बड़ी भूमिका अदा की है।  किसी की पत्नी, किसी की बेटी, किसी की बहु बनना बुरा नहीं है, मगर जब हमारे सम्मान के मूल्यों पर यह रिश्तें मिल रहे हो तो सौदा महंगा है। माना कि स्त्री पुरुष एक दूसरे के पूरक होते है परन्तु जब यह दोनों ओर से सहयोगात्मक हो तो ! गीता बबिता ने अपने पिता को अपने नाम से पहचान दिलायी। कल्पना चावला के पिता कौन थे ? निर्मला सीतारमण के पति कौन है ? इन प्रश्नो के जवाब अधिकत्तर लोगो को नहीं पता होंगे परन्तु ये महिलाएं कौन है और क्या कर सकती हैं यह आज पूरी दुनिया को पता है। 

गुरुवार, 18 अक्टूबर 2018

कन्या पूजन केवल औपचारिकता न बने !

कन्या पूजन केवल औपचारिकता न बने !
कन्या पूजन केवल औपचारिकता न बने !
नवरात्री में सभी देवी  दुर्गा स्वरुप मातृशक्ति का आशीर्वाद जन-जन ने प्राप्त किया। गरबा पंडालों में डंडियां की धूम रही। नृत्य मनमोहक संगीत और रंग बिरंगी पोशाक से परिपूर्ण होकर धर्म और आध्यात्म के साथ जुड़ने का अवसर किसी भी व्यक्ति ने हाथ से नहीं जाने दिया।
                                                                          बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ के इस युद में घर-घर एवं समाज में सामाजिक संस्थाओं के तौर पर कन्या पूजन एवं कन्या भोज के भी आयोजन किये गए। समाज में स्वीकार्य इस परम्परा को सभी ने सहर्ष स्वीकार किया। अनुसरण भी किया ! मगर क्या यह सब परम्पराओं का जीवन की सत्यताओं से जुड़ाव हो सकेगा, यह संभव नहीं लगता हैं।

कन्या में मातृशक्ति है स्वीकारना होगा 


ये देश समाज कन्या के इस स्वरुप को किस रूप में स्वीकार कर रहा है, यह देखकर भी विकृत मानसिकता वाले लोगो की संख्या में कमी नहीं आई है।  आज इस समाज में बेटियों को असुरक्षित माना जा रहा है। हम समाचार पत्रों और मिडिया के माध्यम से देखते है कि तीन वर्ष की कन्या से बलात्कार दो वर्ष की कन्या से अत्याचार तो समाज के विकृत रूप पर शर्म एवं घिन्नता का अनुभव होने लगता है। आज के इस युग में जब हमारे पास उन्नतशील होने की सभी परिस्थियाँ उपस्थित है। हम बेटी को दूसरे दर्जे की मान्यता कैसे दे सकते है। समाज में कई कुरीतियाँ जो हमने आज की असुरक्षा की भावना से उपजी थी। आज मोबाइल एवं कम्प्यूटर के युग में हमने आधुनिकता को तो स्वीकार किया है परन्तु स्त्री शक्ति को स्वीकारने में हमें बहुत देर हो गई हैं। अभी भी वक्त है, स्वीकार करने का ! समय पर यदि हम जाग गए तो हम एक उन्नत राष्ट्र के निर्माण की संकल्पना को साकार कर पाएंगे। 



घर से देना होंगे स्त्री-शक्ति सम्मान के संस्कार 


प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने लाल किले के अपने भाषण में कहा था कि हमें सिर्फ बेटियों पर नहीं बेटों पर भी नज़र रखनी चाहिए। बेटा रात को कितनी बजे घर आता है ? उसके कौन मित्र है ? उसकी क्या आदतें हैं ? वह छोटे-बड़ों का अंतर समझता है या नहीं ? स्त्री के प्रति उसकी नज़रें ठीक दिशा में कार्य कर रही है या नहीं ? जिनको बेटियाँ है वे बेटियों को बांध कर घर में बैठा दे यह वर्तमान परिस्थिति में संभव नहीं है।

मुगलों के समय था असुरक्षा का भाव 

भारतीय इतिहास में जब मुगलों ने इस देश पर आक्रमण किया था तब हमारी बहु-बेटियां सुरक्षित नहीं थी।  उन्हें सुरक्षित करने के लिए रजस्वला होने से पूर्व उनका विवाह संपन्न करा दिया जाता था। इस देश में बाल विवाह की कुरीति ने इस कारण जन्म लिया। यह देश आक्रांताओं से असुरक्षित रहा और उन स्थितियों का सामना करने के बाद देश की परिस्थितियों को बदला है। आज देश में सर्वधर्म समभाव भी है ! स्त्री शिक्षा भी हैं और स्त्री को समान अधिकारों की बात भी की जा रही है। ऐसे में स्त्री की प्रति नज़रिए को बदलना बहुत आवश्यक हैं। हम ऐसे राष्ट्र का निर्माण करना चाहते हैं जहाँ सबको अपनी जिंदगी जीने का हक़ दे सके तो ही हमारी शिक्षा चेतना शुन्य होने से बचेगी ! हमें नारी के सम्मान को प्रथम पायदान पर रखना होगा। 

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नादान बने क्यों बेफिक्र हो ?

नादान बने क्यों बेफिक्र हो ? नादान बने क्यों बेफिक्र हो,  दुनिया जहान से !   हे सिर पे बोझ भी तुम्हारे,  हर लिहाज़ से !!  विनम्रत...