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बुधवार, 25 मार्च 2020

योग और संघ

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योग और संघ 


अपने जीवन के बाल्यकाल से ही मुझे योग की शिक्षा मिल गई थी।  खेलते-खेलते मित्रों के साथ कब संघ के स्वयंसेवक बने और कब व्यायाम के दौरान योग शिक्षा प्राप्त की पता ही नहीं चला और योग हमारे दैनिक जीवनचर्या का भाग बन गया। 




विगत कुछ वर्षों से बाबा रामदेव ने योग एवं स्वदेशी को मिशन बनाकर जनता के सामने रखा तो शायद उनकी प्रस्तुति और संघ की सहजता का अंतर समझ आया।  जमाना जिस दिशा में दौड़ रहा हैं उसे समझने के लिए अब सहजता के साथ व्यावसायिक समिश्रण होना आवश्यक हैं।  यह योग जिसे बचपन में करते थे उन्ही में सूर्य नमस्कार, ताड़ासन, तिष्ट  योग के साथ विभिन्न प्रकार के व्यायाम योग में योग क्र. 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8........  के माध्यम से शरीर में ऊर्जा का संचार तो विभिन्न खेलों के माध्यम से जिसमें स्वयंसेवकों का घेरा बनाकर एक स्वयं सेवक द्वारा राम -राम बोलते हुए साँस न टूटने देने वाले खेल के माध्यम से श्वशन क्रिया पर नियंत्रण ह्रदय की शक्ति का विस्तार हो इसी प्रकार शतरंज वाले खेल के माध्यम से मस्तिष्क का विकास  हमने बचपन से सीखा हैं। 




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योग और संघ 

योग जीवन में अनुशासन, आध्यत्म, जीवन का विस्तृत विकास एवं ऊर्जा के संचार का माध्यम हैं। बालयकाल से योग शिक्षा एक ज़माने में गुरुकुल पद्धति की शिक्षा में दी जाती थी। प्रातः काल समय पर उठना एवं दिनभर की समस्त कार्य पद्धति को एक समयबद्ध प्रक्रिया में पूर्ण करते हुए समय पर रात्रि विश्राम करने से मनुष्य का वर्तमान एवं भविष्य दोनों उज्जवल हो जाते हैं। आज की युवा पीढ़ी में आधुनिकता के साथ आध्यात्म के मार्ग का जुड़ाव सिर्फ संघ जैसे संगठनों से जुड़कर ही संभव हैं। राष्ट्र भक्ति का हिन्दू समाज की समरसता का या विपत्ति के समय मन में दया भाव उत्पन्न हो ऐसी सोच मात्र संघ जैसे विचारो से जुड़कर ही संभव हैं। 




योग यानि जुड़ना, योग यानि सूरत, योग यानि सिद्धांत इन सब पर व्यक्ति को एक साथ अमल करना चाहिए। 



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भारतीय जीवन मूल्यों में योग एक शिक्षा योग एक दर्शन एक जीवन पद्धति जो मानव से मानव को जोड़ने वाली हो बताया गया हैं। संघ और उसके अनुसांगिक संघठनो की स्थापना का मूल तत्व यही हैं कि व्यक्ति व्यक्ति में जगे राष्ट्र प्रेम की भावना और यही भावना देश को विश्व गुरु के स्थान पर काबिज करेगी।

योग के चार प्रकार हैं - राजयोग, कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग। समय समय पर हम इसका पूर्ण विवरण भी आपके सम्मुख रखेंगे परन्तु आज जब संघ और योग का साथ में विवरण करते हैं तो पाते हैं आज जब देश में अधिकांश लोगों के मन में संघ को लेकर यह धारणा हैं की यह भारतीय जनता पार्टी के माध्यम से अपने पूर्व प्रचारक को माननीय श्री नरेंद्र मोदी जी के रूप में देश का प्रधानमंत्री बनाकर राजनीति करता हैं तब यह जानना भी आवश्यक हैं कि मोदी जी का सफल प्रधानमंत्री के रूप में कार्य करना उनकी प्रतिदिन की जीवनचर्या उनकी बेहतरीन जीवनचर्या और नीतिगत फैसले लेते समय उनकी निर्णय क्षमता में दैनिक योग नहीं बल्कि संघ के संस्कारों का योग हैं। एक अनुशासित स्वयंसेवक के रूप में स्वामी विवेकानन्द को आराध्य मानकर जो कार्य करते हैं। 


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योग और संघ 

 मोदी जी स्वामी विवेकानंद के विचारों से प्रभावित हैं। मनुष्य के जीवन में बचपन से केंद्रित मानसिकता ही बड़ा असर करती हैं। आज देश सम्पूर्ण विश्व को प्रभावित कर रहा हैं, तो उसमें लक्ष्य केंद्रित कार्य चित्त का प्रभाव विभिन्न परिस्थितियों से लड़ने की क्षमता का विकास आदि कई बातें महत्वपूर्ण होती हैं। 

योग करने वाला व्यक्ति सदैव प्रसन्नचित्त होता हैं। नियमित योगाभ्यास रोगों से लड़ने कि क्षमता में वृद्धि करता हैं। नकारात्मक विचार एवं तनाव से मुक्त रहता हैं। 


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योग और संघ 
संघ के स्वयंसेवक और योग के विद्यार्थी के रूप में मैं इतना ही कहूँगा मेरे जीवन में दो ही योग हैं।  संघ और राष्ट्र प्रेम मैंने दोनों ही मार्ग अपनाकर जीवन को सुचारू चलाना सीखा। जीवन में किसी को भी सबकुछ हांसिल नहीं होता परन्तु बहुत कुछ प्राप्ति के लिए जीवन के मार्ग और मार्ग पर चलने वाले पथिकों के उत्तम साथ ही आवश्यकता होती हैं। 

आज यह लिखते समय मैं गुडी पड़वा नवसंवत्सर के  पावन पर्व पर सभी को शुभकामनायें प्रेषित करता हूँ।  आज ही के दिन संघ की स्थापना परमपूज्य डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी ने की थी।  उन्हें आद्य सरसंघचालक प्रणाम करता हूँ। मेरे जीवन पथ को संघ मार्ग से जुड़ने का अवसर मिला तथा जीवन में विभिन्न खेलों और योगिक क्रियाओं के माध्यम से मुझे जो ज्ञान और आध्यात्म की शिक्षा मिली हैं। अवसर मिला तो राष्ट्र प्रेम और संघ के लिए न्योछावर कर दूँगा। 




संघ और योग सिर्फ योग नहीं ईश्वरीय योग हैं जो मानव को ईश्वर से रूबरू करता हैं। 





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योग और संघ 


संस्कारों की खान हैं, जीवन का अरमान हैं। 
स्वयंसेवक का जीवन तों बस अनुशासन का प्रमाण हैं।

खेल-खेल में सीख जाते, शिक्षा, धर्म और ज्ञान हैं। 
भाईचारा, त्यागी जीवन देश प्रेम बलवान हैं 

संघ योग का मिश्रण तो भारत देश की शान हैं। 
अटल बिहारी और मोदी जी का शासन ही प्रमाण हैं। 

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मंगलवार, 24 मार्च 2020

कोरोना पर योग को संयोग नहीं सुयोग बनाओ


कोरोना पर भारी योगा
कोरोना पर भारी योगा

भारतीय जीवन मूल्यों में धर्म, संस्कार, संस्कृति, परंपरा, आध्यात्म और अपने जीवन मूल्यों पर स्थापित मार्ग पर चलने के परम्परा हैं। इस देश में युगों-युगों से भारतीय नागरिक कैसे होगा  उसका आचरण उत्तम करने के लिए स्वच्छ मन और पवित्र आत्मा की आवश्यकता होगी यह सभी को बचपन से समझाया जाता है। 


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हम जिन जीवन मूल्यों की अपनाते है उन मूल्यों का आधार मात्र धर्म नहीं बल्कि धर्म की स्थापना और उससे जुड़े कुछ ऐसे आधारभूत बातें होती हैं जो धरातल पर व्यावहारिक लगने में कठिन हो पर जिसने उन सभी बातों को अंगीकार कर लिया उसका जीवन सही मार्ग पर चलता नहीं बल्कि दौड़ने लगता है।  प्रकृति जन्य सुखों से भरा स्वयं के जीवन मूल्यों से अंतर मन एवं आंतरिक शरीर से सुखों का एक मार्ग हैं जिसे राम, कृष्ण, शिव एवं शक्ति सभी मानते हैं। वह हैं "योग"  आजकल जिस योगा भी कहा जाता हैं।  भोग विलास और पाश्चात्य जीवन पद्धति की ओर दौड़ते इस युग में प्रत्येक व्यक्ति योग की अपेक्षा मेडिक्लेम और उससे जुडी बीमा पॉलिसी  लेकर सुरक्षित महसूस करने का प्रयत्न करता हैं परन्तु मेरे शरीर में इतना सुख हैं की मैं योग के माध्यम से ईश्वर की भक्ति, आत्म संतुलित और स्वास्थ्य का अनुपम भंडार प्राप्त कर लूंगा यह सोच व्यक्ति के मन में आती ही नहीं हैं। 

कुछ दिनों पूर्व एक जैनाचार्य जी के मार्गदर्शन में मैंने सुना था कि आजकल व्यक्ति सुबह उठकर सबसे पहले देखता हैं की मेरा मोबाइल चार्ज  हैं की नहीं वह यह नहीं देखता की मैं, मेरा शरीर मेरी आत्मा और जीवनचर्या की योजना चार्ज हैं या नहीं।  भौतिक सुखों की होड़ जिंदगी को हरा रही हैं।  ऐसे में व्यक्ति का स्वयं चार्ज होना जरुरी हैं।  जीवन के इस कठिन पथ पर पग -पग पर चुनौतियाँ हैं।  हमें इन चुनौतियों से लड़ने के लिए सिर्फ शरीर नहीं आत्मबल को मजबूत बनाना पड़ेगा।  पाश्चात्य पद्धति की जिम में संगीत की मधुर ध्वनि के साथ पसीना बहा कर बॉडी मेंटेन करने से शरीर सौष्ठव तो हो जाता हैं, पर शरीर और मन का लचीलापन जो योग के माध्यम से प्राप्त होता हैं जिम में संभव नहीं हैं। हमारी सन्त परम्परा में भी इसका उल्लेख हैं। 


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फिट इंडिया 

भारतीय संत परम्परा में ग्रंथो पर आधारित तथ्यों के अलावा पतंजलि योग पीठ के माध्यम से बाबा रामदेव ने मिडिया, सोशल मीडिया, कैंप, प्रचार-प्रसार आदि को माध्यम बना कर योग को घर-घर तक पहुँचाने में कामयाबी प्राप्त की। भारतीय धर्म शास्त्रों में योग को सदैव आधार बनाया गया हैं। ऐतिहासिक प्रमाणों से यह कहा जा सकता हैं कि भारतीय सांस्कृतिक दर्शन हैं जो सम्पूर्ण विश्व को मार्गदर्शन प्रदान कर रहा हैं। 




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पतंजलि योग सूत्र 

आज हम covid 19 वायरस कारण कोरोना नामक बीमारी से वैश्विक महामारी से झुझ रहे हैं।  संक्रमणकारी यह रोग जिस स्थिति से विश्व के अन्य देशों को प्रभावित कर रहा हैं, ऐसा भारतीय वातावरण में नहीं हैं। सरकार के सजगता के साथ भारतीय नागरिको के पास प्रकृति जन्य साधन जैसे आयुर्वेद का काढ़ा, नीम, तुलसी, एलोवेरा, नीम्बू , आंवला, चिरायता जैसे औषिधियाँ हैं। वहीं योग के माध्यम से अपनी श्वसन क्रिया पर नियंत्रण करने वाले अनुलोम-विलोम, कपाल भारती, भ्रामरी, सूर्यनमस्कार जैसी योगिक एवं व्यायाम की क्रियाएं हैं।  जिससे शरीर को एवं योग साधना के माध्यम से चित एवं मन को एकाग्र कर आत्मा शुद्धि का कार्य किया जाता हैं। 



कुंडलीनी को जागृत करना योग को विशिष्ठ शैलियों में आता हैं जिससे मनुष्य देवत्व की ओर अग्रसर होता हैं।  अभी हमें योग की उस स्थिति का चिंतन नहीं करना हैं क्यूंकि भागदोड की इस जिंदगी में सहज साधना से जन साधारण के मानस तक पहुँचाने वाली बातों को ही करना महत्वपूर्ण होता हैं। देश का नागरिक जिन सामान्य नियमों में चलकर स्वयं का उध्दार कर सके उतना ही काफी होता हैं। 



योग शब्द का अर्थ सम्बन्ध या मिलन जुड़ाव होता हैं। दर्शनशास्त्र में योग का अर्थ जीवात्मा और परमात्मा का मिलन "योग" हैं।  भारतीय परम्परा में पतंजलि ने योग सूत्र की रचना  हैं। समय-समय पर सभी ने अपनी व्याख्या के अनुसार योग के बारे में कहा हैं, जिसमें गोस्वामी तुलसीदास, कबीर, गुरु गोविन्द सिंह, जैन-बौद्ध धर्म के विभिन्न रचनाकारों ने इसे अपनी विचारधारा के अनुसार रचा हैं। 






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YOGA AT HOME 

योग मात्र अक्षरों से रचा एक शब्द नहीं बल्कि विश्व को एक सूत्र में बांधने वाला एक बंधन हैं। भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र संघ में 21 जून को योग दिवस घोषित करने की बात स्वीकृत कराकर भारत को पुनः विश्व गुरु का दर्जा प्राप्त हो उस ओर कदम बढ़ाया हैं। भारतीय शिक्षा एवं संस्कृति जिसमें शून्य की खोज से लेकर आयुर्वेद की श्रुश्रुत एवं चरक सहिंता हो या योग दर्शन एक नया मार्ग प्रदान किया हैं। 



पाश्चात्य संस्कृति की भागदौड़ भरी जिंदगी से आध्यात्म की ओर बढ़ने की परम्परा को श्री श्री रवि शंकर ने विश्व के कई देशों तक पहुँचाया।  आर्ट ऑफ़ लिविंग के माध्यम से अपनी जीवन पद्धिति में सुख और आनंद की अनुभूति का मार्ग बताया हैं। 



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श्री श्री रविशंकर जी 
आइये हम सभी मिलकर भारतीय संस्कारों के इस अद्भुत खजाने का आनंद लें। खुशियों को भौतिक वस्तुओं में तलाशने की अपेक्षा अंतरमन में खोजें। सुख कही और नहीं हमारे अंदर है। ईश्वर कही और नहीं हमारे मध्य हैं। चित्त और मन की एकाग्रता ही योग हैं।  विश्व की यह भयानक बीमारी हम अपने अंदर प्रवेशित न होने दे।




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योग को संयोग नहीं सुयोग बनाओ। 
अपने अंगो को सुडोल और मजबूत बनाओ।

जीवन में श्वसन पर नियंत्रण जरुरी। 
अनुशासन के साथ संयम से भी न बने कोई दुरी 

आज मिलकर अपना सुख अपनाएँ। 
योग को अपनाकर दुःख को दूर भगाएँ  

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नादान बने क्यों बेफिक्र हो ?

नादान बने क्यों बेफिक्र हो ? नादान बने क्यों बेफिक्र हो,  दुनिया जहान से !   हे सिर पे बोझ भी तुम्हारे,  हर लिहाज़ से !!  विनम्रत...