शुक्रवार, 17 अगस्त 2018

सरकारें निजी क्षेत्रों के विकास में भी सहायक बने !

भारत की अर्थव्यवस्था कृषि आधारित है और इस देश में किसान को अन्नदाता कहा जाता है। देश की वित्त व्यवस्थाओं  का संयोजन करते समय सरकारें सभी वर्गों का ध्यान रखने का प्रयास करती है। विगत कुछ वर्षों से मेरे राज्य मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ने कृषकों  एवं कर्मचारियों के हितों  की नीतियों का निर्माण कर शेष सभी वर्गों को नजरअंदाज कर दिया है। 
                                          सरकार की इन् नीतियों के  कारण सामान्य मध्यम वर्ग, व्यापारी, छोटे उद्योग, कुटीर उद्योग, शिक्षा एवं स्वास्थ्य में जो निजी  संस्थायें कार्य कर रही है, उनकी भी भरपूर उपेक्षा हुई है। देश एवं प्रदेश के विकास में सभी का सहयोग होता है, सबकी भूमिकाएं होती है, सबका परिश्रम होता है। तभी देश खड़ा होता है, परन्तु सरकार अपनी नीतियों का निर्धारण करते समय सबके विकास को छोड़कर वोट बैंक की पॉलिसी से कार्य करती है।  ऐसे में कई वर्ग जो सड़कों पर आने पर मतदान के दिन या तो सरकार के विपक्ष में मतदान करते है या अपने घरों में चुपचाप बैठकर मतदान जैसे पुनीत कार्य की भी उपेक्षा करते है। 

कृषि अर्थव्यवस्था के पहलु देखें तो सरकार सहकारी बैंकों से शुन्य प्रतिशत ब्याज़ दरों पर ऋण, प्राकृतिक आपदा पर मुवाअजा और अब सरकारी योजना की पराकाष्ठा तब हो गई, जब मूल्य निर्धारण के मुद्दे पर भवान्तर योजना से सरकार किसानों को पैसा बाँटकर अपने पक्ष में करने में लगी है। देश-प्रदेश में जब भी कभी वित्त व्यवस्था की चर्चा होती है, तो किसानों की भूमिका पर केंद्र बिंदु होता है। परन्तु क्या किसी क्षेत्र का विकास उस क्षेत्र की बेहतरीन शिक्षा एवं उत्तम स्वास्थ्य के बगैर सम्भव है, कदापि नहीं ! 
                                                                                                             सरकारें समझें किसी क्षेत्र की उत्तम और बेहतर व्यवस्थाओं को सार्वजनिक रूप से निजीकरण के माध्यम से चलना उत्तम होता है। आज शहरों में या गाँव में निवासरत लोगों की जीवन पध्दति में अधिक पैसा खर्च करके उत्तम व्यवस्थाओं की ओर जाने का माद्दा बड़ा है। सरकारी व्यवस्थाओं पर उस क्षेत्र में कार्यरत कर्मचारियों अधिकारीयों को भी भरोसा नहीं होता !
सरकारें जानती है सब बातें ! परन्तु निजीकरण को बढ़ावा देने से डरती हैं। सुविधाओं को मुहैया करने से बचती है।
     जनसुविधाओं की बेहतरी के लिए ऊर्जा जैसे क्षेत्रों को भी निजीकरण से जोड़ने का जो लक्ष्य है, वही उत्तम प्रयास है। इन्हे तुरंत लागू किया जाना चाहिए। 


सरकारी योजनाओं को जनता तक पहुँचाने का माध्यम सदैव निजी शिक्षण संस्थाओं एवं नर्सिंग होम को भी बनाया जाता हैं। सरकार आँखें खोलकर नहीं बल्कि दिल खोलकर बाँट रही है। तभी मंदसौर क्षेत्र में किसान आंदोलन के दौरान जो दुःख सामने आया वो विपक्षी राजनीति के लिए उपयोगी बिंदु एवं मुद्दे थे,  परन्तु क्या वास्तव में प्रदेश का किसान बसों को जलने वाला ही है? बिजली की चोरी करने वाला ही है? डोडाचूरा की तस्करी करने वाला ही है? उत्तर मिलेगा 'नहीं'! और दोष दिया जायेगा सरकारी नीतियों को! मोदी जी ने "सबका साथ-सबका विकास" का नारा तो दिया परन्तु प्रदेश सरकार अपनी योजनाएँ उसी के  अनुरूप बनायें तभी क्रांति होगी और विकास पनपेगा।                                                                                                  

गुरुवार, 16 अगस्त 2018

अटल स्मृति



atal bihari vajpayee
अटल स्मृति 



आँखों में आंसू और दिल में अँधियारा है !

भारत के भाग्य को बस एक अटल सहारा है !!


Atal Bihari vajpayee
अटल स्मृति 


दुश्मन भी दोस्त बने, विरोधी करे प्यार !
मित्रों और विरोधियों से रहा समान व्यव्हार !!

atal bihari vajpayee, sonia gandhi, lalkrishna advani, manmohan singh
अटल स्मृति 

मुस्कुराता चेहरा दिल में खुलापन रहा !
अटल जी की याद में आज सूनापन रहा !!

atal bihari vajpayee laugh
अटल स्मृति 


मन और मस्तिष्क में सारे शब्द शून्य हैं !
देश का एक बड़ा कवि हृदय सदा के लिए मौन हैं !!

atal bihari vajpayee kavita (poem)
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जग को अपनापन और देश को विकास दिया !
भारत में स्वर्णिम चतुर्भुज से आकर दिया !!

swarnim chaturbhuj, Golden Quadrilateral
अटल स्मृति 

चाहा था नदियां भी जुड़कर बह जाएँगी !
देश की चंहु ओर जल से किस्मत जुड़ जाएँगी !!

ganga jamuna
अटल स्मृति 

आएगा क्षण प्रति-क्षण चेहरा वह याद अब !
अटल जी तो मौन है पर यादों का भण्डार सब !!

atal bihari vajpayee
अटल स्मृति 

बुधवार, 15 अगस्त 2018

मन में अभी अंधेरे हैं !




मैंने अपना सारा बचपन उनके साथ गुजरा है !
दादाजी होकर भी मुझको दोस्त जैसा सहारा है !!





दिल में बसे हुए हो अब भी लगता नहीं अब चलें गए !
घर में साया बनकर अब भी मन में यूँ ही बसे रहे !!





चलें गए हो हमें छोड़कर सुना-सुना लगता हैं !
आज जन्मदिन है आपका मन को अनमना लगता हैं !!





 


क्या अब वापिस आ पाओगे ?
मेरा बचपन लौटा पाओगे ??
सारे प्रश्न अधूरे हैं !





इंतज़ार करता हूँ अब भी मन में अभी अंधेरे हैं !
काम आपके  पूरे कर लूँ, तब भी स्वप्न अधूरे हैं !! 

मंगलवार, 14 अगस्त 2018

काश नदियों को जोड़ ही जाते "अटल जी "

स्वतन्त्र भारत में गैर कॉग्रेसी सरकारों का वर्चस्व कम ही रह पाया 
है। गठबंधन सरकारों के दौर में एन.डी.ए अर्थात नेशनल डेमोक्रेटिक 
अलायन्स 'जों की भारतीय जनता पार्टी की अगुआई में चलने वाला 
गठबंधन है' की  सरकार जो की पूर्व प्रधानमत्री श्री अटल बिहारी 
वाजपेयी  की नेतृत्व में बनी थी, एक सफल सरकार कही जा सकती 
है। अटल जी ने संसद में रहकर कई प्रधानमंत्री देखे और सरकारें दे -
-खी।  उसीका नतीजा था कि जब राष्ट्र के प्रधानमंत्री के रूप में जब 
उनको अवसर मिला उन्होंने अपने सपने जनता के सामने रखे !
संयुक्त राष्ट्र संगठन में हिंदी में भाषण हो, उत्तम विदेश नीति हों 
या स्वर्णिम चतुर्भुज योजना के माध्यम से सड़कों का विस्तार कर 
उन्होंने देश को सड़कों के मामलों में विश्व स्तरीय प्रतिष्ठा दिलाने 
का पूर्ण प्रयास किया। 
https://pravinbhaikikalam.blogspot.com/2018/08/blog-post_16.html














अटल जी की योजनाओं में नदियों को जोड़ने की योजना प्रमुख थी। 
अटल जी जानतें थे " देश बड़ा है जहाँ कहीं नदियाँ सुखी है तो कहीं 
बाढ़ जैसे हालत हो जाते है " यदि देश की नदियों को जोड़ दिया जाता 
तो विकास की योजनाओं को लागू करना आसान हो जायेगा। आज 
जब वैश्विक परिस्थितियों में ग्लोबल वार्मिंग एक विकराल रूप धारण 
कर परेशानियाँ खड़ी कर रही है ऐसे में प्रतिवर्ष बाढ़ की समस्याओं से 
जूझता भारत आज एक बार फिर से अटल जी को याद कर रहा है,
"काश अटल जी नदियों को जोड़ गयें होते !" 














आधा भारत आज बाढ़ के हालातों से जूझ रहा है, तो लगता है पाँच 
वर्षों तक वही सरकार फिर से बनती और नदियों के जोड़ने के स्वप्न 
की दिशा में एक कदम भी आगे बढ़ा पाते तो भारत विकास की गाथा 
के प्रथम अध्याय पर रहकर विश्व में अपना सम्मान कायम कर 
सकता। 


















आज जब नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री के रूप में विकास की सरिता 
प्रवाहित कर रहे हैं।  ऐसे में अटल जी के इस पुनीत अभियान पर फिर 
से काम करने का विचार करना चाहियें। समृध्द एवं विकसित राष्ट्र की 
संकल्पना में भारत की नदियाँ महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन कर सक-
-ती हैं। नदियाँ देश में तबाही का नहीं अपितु जीवनदायी जल - गंगा ,
यमुना, नर्मदा,रुपी धर्म एवं विकास का आधार है  ! जिन्हे जोड़कर हम 
सिर्फ नदियों का जल ही नहीं देश के संस्कारों को जोड़ने का प्रयास कर 
सकते हैं। 

सोमवार, 13 अगस्त 2018

यें जश्न कब तक..... ?

 गुलामी की यादें लेकर 
                    आज़ादी का जश्न आ गया !
भगत सिंह की शहादत भुलाकर 
                    भ्रष्टाचरियों का वक्त आ गया !!
तिलक का नारा भूल गया है , ये भारत
                   दिल में कुछ अरमान जगे  वो वक्त आ गया !
नेता अपनी जेबें भर कर चलते हैं 
                   मतदाता के पास जाने का वक्त आ गया !!
ईमान कहाँ सभी का जिन्दा हैं 
                   बेटी तेरे सामने सब शर्मिंदा हैं !
जग को कहाँ सुधरेंगे "हम" खुद ही सुधर जाएँ हम       
                    समझने और समझाने का यह वक्त आ गया !!
गंगा जमनी तहज़ीबें सब साथ चलें, शिक्षा खूब मिले यह संस्कार बने 
                    विश्व गुरु फिर से बनने का वक्त आ गया !

गुलामी की यादें लेकर 
                    आज़ादी का जश्न आ गया !!

समरसता सत्ता प्राप्ति का मंत्र नहीं, हिन्दू जीवन पध्दति का तंत्र बने।

आज़ादी के सत्तर वर्षों में सबसे बड़ा भाग कांग्रेस की सत्ता का रहा है। 
मुस्लिम समाज को वोट बैंक और बिखरा हुआ हिन्दू समाज कांग्रेस 
की सत्ता की चाबी बना रहा। 
                              ना मुस्लिमों का विकास हुआ ना हिन्दू संस्कृति और 
सभ्यता को बल मिला ! भारत के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में लगातार
सत्ता का केंद्र बनी कांग्रेस राम जन्म भूमि जैसे मुद्दे के उठने के पश्चात् 
आज तक सत्ता में नहीं आ पाई ! भारत में समरसता का आभाव ऊंच - नीच 
की भावना एवं आरक्षण जैसे गंभीर और चिंतनीय विषयों पर सरकारों के 
आंख मूंदने से प्रारम्भ होता हैं। 
                      संघ के सर संघचालक  श्री मोहन राव भागवत के बयान 
''आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए'' को समाज में राजनीतिज्ञों ने संकुचित 
भावनाओं के साथ फैलाया।  आरक्षण की समीक्षा से समरसता कब होगी 
यह सोचना उचित नहीं हैं। 
                
 समरसता सत्ता प्राप्ति का मंत्र नहीं, हिन्दू जीवन पध्दति का तंत्र बने।
 समरसता सत्ता प्राप्ति का मंत्र नहीं, हिन्दू जीवन पध्दति का तंत्र बने। 

   











                    राष्ट्रव्यापी मुद्दों पर जब हम सभी भारतवासी एक हो जाते
हैं तो ऐसे में हिन्दू समाज अपने धर्म संस्कार, संस्कृति की रक्षा के लिए एक
नहीं हो सकतें ! विगत वर्षों में जब राम सेतु के मुद्दे पर संघ ने सड़कों पर 
आकर आवाज बुलंद की तों जो हिन्दू समाज सड़कों पर आया वों समरस नहीं
था! यह सोचना उचित नहीं होगा। 
                      यदि राम हम सबके आराध्य हैं तो भारत माता और जीवनदायिनी
गंगा भी हम सभी के पूज्यनीय और श्रध्दा का केंद्र हैं।
                     आओ हम सभी एक समरस हिन्दू समाज को पुनर्गठित करें !
                     एक समरस हिन्दू समाज ही सबकों साथ लेकर चलने एवं भारत माता 
को विश्व गुरु के स्थान पर पुनर्स्थापित करने में सफलता प्राप्त करेगा।  

रविवार, 12 अगस्त 2018

व्यवसायिकता और व्यवहारिकता

व्यवसायिकता और व्यवहारिकता शब्दों में समानता हो सकती हैं।  
परन्तु अर्थ में एकदम भिन्नता हैं। 
धन, वैभव और अर्थ प्रधानता के इस युग में व्यवहारिकता को मूर्खता 
मानने वाले लोग बहुत हैं।
परन्तु एक समय आयेगा जब अर्थ को अनर्थ माना जायेगा 
और हम धन लेकर मित्र ढूंढेंगे और मिलेगा 
एक बड़ा शुन्य...........................
मित्रों आप क्या सोचते हैं ?....... 

शनिवार, 11 अगस्त 2018

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पृथ्वी हमसे प्यार करें और 
          हम उसका अपमान करें !!
नहीं बचेगा कुछ धरती पर जो 
          प्रकृति से हम खिलवाड़ करें !!
खड़ा हिमालय रक्षक बन कर 
           उसका क्यों अपमान करें !!
आई तबाही शिव तांडव से 
           जनता हाहाकार करें !!
तीर्थ बने हैं हिम शिखरों पर 
            देश का स्वाभिमान बने !!
सूरा सुंदरी के चक्कर में 
            यहां भी व्यभिचार बढ़े !!
देश का हर कंकर शंकर हैं 
            कण कण में हैं देव बसे !!
मानव जीवन पाया तुमने 
            राक्षस कैसे आन बसे !!
अब भी मिला है मौका तुमको 
            धरती का सम्मान करों !!
खड़ा हिमालय रक्षस बनकर 
            मन में स्वाभिमान भरो !!
सोने की चिड़िया है भारत उसका 
            कुछ सम्मान  करों !!
धरती नहीं मांगती कुछ भी 
             वृक्षों से उसकी गोद भरों !!

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नादान बने क्यों बेफिक्र हो ?

नादान बने क्यों बेफिक्र हो ? नादान बने क्यों बेफिक्र हो,  दुनिया जहान से !   हे सिर पे बोझ भी तुम्हारे,  हर लिहाज़ से !!  विनम्रत...